
आज कार खरीदते समय सबसे पहला सवाल सेफ्टी को लेकर ही उठता है। आम तौर पर लोग ग्लोबल NCAP या भारत NCAP की रेटिंग देखकर फैसला करते हैं कि कोई कार कितनी सुरक्षित है। लेकिन जब बात रॉल्स-रॉयस जैसी अल्ट्रा-लग्जरी कारों की आती है, तो यह पैमाना अचानक गायब हो जाता है। करोड़ों रुपये की इन कारों की कोई आधिकारिक क्रैश टेस्ट रेटिंग नहीं होती। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर दुनिया की सबसे महंगी और प्रतिष्ठित कारों को इस प्रक्रिया से दूर क्यों रखा जाता है।
आज के ऑटोमोबाइल बाजार में सेफ्टी रेटिंग किसी भी कार की विश्वसनीयता का अहम आधार बन चुकी है। ग्लोबल NCAP और भारत NCAP जैसी संस्थाएं कारों को फ्रंटल, साइड और अन्य टक्कर परीक्षणों से गुजारकर उनकी सुरक्षा क्षमता को परखती हैं। इससे आम उपभोक्ता को यह समझने में मदद मिलती है कि हादसे की स्थिति में कार यात्रियों को कितनी सुरक्षा दे पाएगी। ज्यादातर मास-मार्केट और प्रीमियम कारें इन टेस्ट से गुजरती हैं, लेकिन रॉल्स-रॉयस इस दायरे से बाहर रहती है।
रॉल्स-रॉयस मोटर कार्स खुद को कार निर्माता से ज्यादा एक बेस्पोक लग्जरी ब्रांड मानती है। यहां हर कार ग्राहक की पसंद के अनुसार हाथ से तैयार की जाती है। डिजाइन, इंटीरियर, मटेरियल और फीचर्स लगभग हर कार में अलग होते हैं। यही वजह है कि इन्हें आम कारों की तरह एक जैसी यूनिट मानकर टेस्ट करना आसान नहीं होता।
रॉल्स-रॉयस के क्रैश टेस्ट न होने की सबसे बड़ी वजह उसका अत्यधिक कस्टमाइजेशन है। एक ही मॉडल की दो कारें भी वजन और संरचना के लिहाज से अलग हो सकती हैं। अगर हर अलग कॉन्फिगरेशन के लिए क्रैश टेस्ट किया जाए, तो इसके लिए कई कारों को जानबूझकर नष्ट करना पड़ेगा। यह न सिर्फ बेहद महंगा है, बल्कि व्यावहारिक भी नहीं माना जाता।
इसके अलावा रॉल्स-रॉयस का सालाना उत्पादन भी बहुत सीमित होता है। जहां आम कार कंपनियां लाखों यूनिट बनाती हैं, वहीं रॉल्स-रॉयस की संख्या कुछ हजार तक ही रहती है। ऐसे लो-वॉल्यूम ब्रांड के लिए अलग-अलग क्रैश टेस्ट कारों का इस्तेमाल करना आर्थिक रूप से तर्कसंगत नहीं समझा जाता।
हालांकि यह मान लेना गलत होगा कि रॉल्स-रॉयस सेफ्टी को नजरअंदाज करती है। कंपनी अपनी कारों में मजबूत एल्यूमिनियम स्पेसफ्रेम, मल्टी-एयरबैग सिस्टम, एडवांस ड्राइवर असिस्टेंस फीचर्स और उच्च गुणवत्ता वाले मटेरियल का इस्तेमाल करती है। इन कारों को आंतरिक स्तर पर सिमुलेशन, कंप्यूटर मॉडलिंग और प्राइवेट टेस्टिंग से गुजारा जाता है, ताकि अंतरराष्ट्रीय सेफ्टी मानकों का पालन सुनिश्चित किया जा सके।
क्रैश टेस्ट का मतलब कार को सार्वजनिक रूप से टक्कर मारकर नष्ट करना होता है। रॉल्स-रॉयस जैसी अल्ट्रा-लग्जरी कारों के लिए यह प्रक्रिया ब्रांड इमेज के लिहाज से भी संवेदनशील मानी जाती है। कंपनी अपने उत्पादों को अल्टीमेट लग्जरी और भरोसेमंद सुरक्षा के प्रतीक के रूप में पेश करती है। यही वजह है कि यहां सेफ्टी को दिखाया नहीं जाता, बल्कि चुपचाप और पूरी मजबूती से सुनिश्चित किया जाता है।
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