सबसे बड़ी खबर : उत्तर प्रदेश के ‘राजभवन‘ का नाम अब ‘जन भवन’

लखनऊ। गृह मंत्रालय, भारत सरकार, नई दिल्ली द्वारा राज्यपाल के आधिकारिक आवासों के नामकरण के मानकीकरण के संबंध में निर्गत निर्देशों के अनुपालन में, उत्तर प्रदेश के राज्यपाल के आधिकारिक आवास का नाम परिवर्तन किया गया है। पूर्व में ‘राज भवन‘ के नाम से ज्ञात राज्यपाल के आधिकारिक आवास को अब “जन भवन” नाम दिया गया है। उक्त निर्देश के क्रम में उत्तर प्रदेश के राज्यपाल का आधिकारिक आवास तत्काल प्रभाव से समस्त शासकीय एवं वैधानिक प्रयोजनों के लिए ‘जन भवन‘ के नाम से अभिहित एवं संबोधित किया जाएगा।

राजभवन का इतिहास बहुत ही गौरवशाली

उत्तर प्रदेश के राजभवन का इतिहास बहुत ही दिलचस्प और गौरवशाली है। यह इमारत सिर्फ एक सरकारी आवास नहीं, बल्कि अवध के नवाबों से लेकर ब्रिटिश शासन और आज के लोकतांत्रिक भारत तक के सफर की गवाह रही है।

इतिहास की प्रमुख कड़ियां : कोठी हयात बख्श (प्रारंभिक दौर): राजभवन का मूल नाम ‘कोठी हयात बख्श’ था। ‘हयात बख्श’ का अर्थ होता है— ‘जीवन देने वाला’। निर्माण: इसका निर्माण 18वीं शताब्दी के अंत में (लगभग 1798 ई.) अवध के नवाब सआदत अली खान के काल में हुआ था।
इस शानदार इमारत का डिजाइन फ्रांसीसी मेजर जनरल क्लाउड मार्टिन ने तैयार किया था। उन्होंने इसमें यूरोपीय और भारतीय वास्तुकला का बेहतरीन मिश्रण किया था।

ब्रिटिश काल और ‘बैंक कोठी’ : 1857 की क्रांति के समय और उसके बाद, इस इमारत का उपयोग ब्रिटिश अधिकारियों द्वारा किया जाने लगा। कहा जाता है कि 1858 में मेजर हडसन (जिन्होंने बहादुर शाह जफर के बेटों की हत्या की थी) ने इसी कोठी में अंतिम सांस ली थी। एक समय पर यहाँ लखनऊ के कमिश्नर मेजर जॉनशोर बैंक रहा करते थे, जिस कारण इसे ‘बैंक कोठी’ भी कहा जाने लगा। उनके नाम पर ही पास की सड़क का नाम ‘बैंक रोड’ पड़ा था।

राज्यपाल का निवास: 1921 में जब लखनऊ को संयुक्त प्रांत (United Provinces) की राजधानी बनाया गया, तब इस इमारत को आधिकारिक रूप से ‘गवर्नमेंट हाउस’ घोषित कर दिया गया। 1947 में आजादी के बाद इसका नाम बदलकर ‘राजभवन’ कर दिया गया। भारत की पहली महिला राज्यपाल, सरोजिनी नायडू, यहाँ रहने वाली पहली राज्यपाल थीं।

हाल ही में (दिसंबर 2025 के आसपास) केंद्र सरकार और गृह मंत्रालय के सुझाव पर कई राज्यों ने औपनिवेशिक प्रतीकों को हटाने के लिए ‘राजभवन’ का नाम बदलकर ‘लोक भवन’ (न कि जन भवन) करने की प्रक्रिया शुरू की। उत्तर प्रदेश में भी इसे ‘लोक भवन’ के रूप में संबोधित करने के प्रस्ताव पर चर्चा हुई है ताकि ‘राज’ (शासन) के बजाय ‘लोक’ (जनता) की भावना को प्राथमिकता दी जा सके।

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