युद्ध, जज़्बा और बलिदान की कहानी ‘इक्कीस’: धर्मेंद्र का भावुक अभिनय, अगस्त्य नंदा की शानदार एंट्री

Mumbai : कुछ फिल्में सिर्फ कहानी नहीं सुनातीं, बल्कि दर्शक के दिल और सोच दोनों को गहराई से छू जाती हैं। ‘इक्कीस’ ऐसी ही एक प्रभावशाली और संवेदनशील फिल्म है, जो युद्ध की भयावहता के बीच मानव भावनाओं, बलिदान और रिश्तों की ताकत को सामने रखती है। यह फिल्म गर्व भी कराती है, आंखें नम भी करती है और अंत तक दर्शक को अपने साथ बांधे रखती है।

Movie Review: इक्कीस
रिलीज डेट: 1 जनवरी 2026
निर्देशक: श्रीराम राघवन
निर्माता: दिनेश विजन, बिन्नी पड्डा
लेखक: अरिजीत बिस्वास, श्रीराम राघवन, पूजा सुरती
कलाकार: अगस्त्य नंदा, जयदीप अहलावत, सिमर भाटिया, धर्मेंद्र

कहानी

‘इक्कीस’ 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के वीर नायक सेकेंड लेफ्टिनेंट अरुण खेत्रपाल की प्रेरक कहानी है, जिन्होंने देश के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए। फिल्म की सबसे बड़ी खासियत इसकी दो टाइमलाइन है।
एक ओर 1970 के दशक में अरुण की सैन्य ट्रेनिंग और युद्ध की घटनाएं दिखाई गई हैं, वहीं दूसरी ओर साल 2001 में उनके पिता ब्रिगेडियर एम.एल. खेत्रपाल (धर्मेंद्र) की पाकिस्तान यात्रा के जरिए बेटे की यादों और दर्द को बेहद भावुक अंदाज में पिरोया गया है।

निर्देशक ने कहानी को सिर्फ युद्ध के मैदान तक सीमित नहीं रखा, बल्कि यह भी दिखाया है कि युद्ध सैनिकों और उनके परिवारों के जीवन को किस तरह हमेशा के लिए बदल देता है। फिल्म बार-बार यह सवाल उठाती है कि आखिर युद्ध क्यों होते हैं और उनकी कीमत कौन चुकाता है।

अभिनय

फिल्म की सबसे बड़ी ताकत इसका दमदार अभिनय है।
अगस्त्य नंदा (अमिताभ बच्चन के नाती) ने अरुण खेत्रपाल के किरदार में खुद को पूरी तरह साबित किया है। उनकी मासूमियत, साहस और भावनात्मक गहराई दर्शकों को प्रभावित करती है। यह कहना गलत नहीं होगा कि ‘इक्कीस’ उन्हें भविष्य का सुपरस्टार साबित करने की दिशा में मजबूत कदम है।

सिमर भाटिया ने अपने डेब्यू में सीमित स्क्रीन टाइम के बावजूद प्रभाव छोड़ा है और उनका काम उम्मीद जगाता है।
धर्मेंद्र और जयदीप अहलावत फिल्म की आत्मा हैं। धर्मेंद्र का शांत, संयमित और दर्द से भरा अभिनय दिल को छू जाता है। कई दृश्य ऐसे हैं जहां वे बिना संवाद बोले ही सब कुछ कह जाते हैं। ऐसा लगता है मानो यह फिल्म उनके लिए बेहद निजी हो।
जयदीप अहलावत हर बार की तरह यहां भी अपनी मजबूत मौजूदगी दर्ज कराते हैं।

इसके अलावा दीपक डोबरियाल, असरानी, विवान शाह और सिकंदर खेर जैसे कलाकार छोटे-छोटे रोल में भी याद रह जाते हैं। पूरी कास्ट एकजुट होकर फिल्म को मजबूती देती है।

निर्देशन

श्रीराम राघवन जैसी संवेदनशील कहानी को संतुलन के साथ पेश करने में सफल रहे हैं। उन्होंने युद्ध और भावनाओं के बीच बेहतरीन तालमेल बिठाया है। फिल्म कहीं भी महज बायोपिक बनकर नहीं रह जाती, बल्कि मानवीय संवेदनाओं का सशक्त चित्रण करती है। भारत-पाक रिश्तों को लेकर जो संदेश फिल्म देती है, वह बिना उपदेशात्मक हुए दर्शकों तक पहुंचता है।

क्या है खास

  • सशक्त और प्रेरक कहानी
  • भावुक लेकिन गरिमामय प्रस्तुति
  • शानदार सिनेमैटोग्राफी

दमदार कास्टिंग

युद्ध के साथ विभाजन का दर्द और पारिवारिक भावनाएं

क्या रह गई कमी

फिल्म की एडिटिंग कुछ जगहों पर उलझन पैदा करती है। कुछ युद्ध दृश्य अपेक्षाकृत कमजोर लगते हैं।

म्यूजिक और वीएफएक्स

फिल्म में वीएफएक्स का सीमित लेकिन प्रभावी इस्तेमाल हुआ है। बैकग्राउंड स्कोर भावनाओं को और गहराई देता है।
‘सितारे’ गीत दिल को सुकून देता है, जबकि ‘बन के दिखा इक्कीस’ देशभक्ति और जोश से भर देता है।

देखें या नहीं

वीर शहीद अरुण खेत्रपाल को श्रद्धांजलि देने और दिवंगत धर्मेंद्र के यादगार अभिनय को देखने के लिए ‘इक्कीस’ जरूर देखी जानी चाहिए। यह फिल्म फौजियों और उनके परिवारों के जीवन को समझने का मौका देती है। ओटीटी पर यह ज्यादा लोकप्रिय हो सकती है, लेकिन थिएटर में इसका भावनात्मक असर अलग ही है।
अगर आप संवेदनशील, शांत और भावनात्मक फिल्मों के शौकीन हैं, तो ‘इक्कीस’ आपको जरूर पसंद आएगी।

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