
कोलकाता 17 जनवरी 2026 : कलकत्ता के जैन शोधकर्ता अर्पित शाह ने पिछले तीन महीनों में प्रतिष्ठित शैक्षणिक मंचों पर अपने शोधकार्य से जैन विद्वता को नया आयाम दिया है।गत रविवार, 11 जनवरी 2026 को गुजरात विश्वविद्यालय में श्रुत रत्नाकर तथा JAINA (USA) द्वारा आयोजित “5th International Jain Conference” में अर्पित शाह ने अपना नवीनतम शोधपत्र प्रस्तुत किया। यह उनकी शोध श्रृंखला की तीसरी कड़ी थी। इससे पहले नवंबर 2025 में विश्वविख्यात नालंदा विश्वविद्यालय में और उसके बाद मुंबई के ऋषभायन में (दिसंबर 2025) जैन आचार्यों, अंतर्राष्ट्रीय विद्वानों, प्रोफेसरों, शोधकर्ताओं, धार्मिक चिंतकों और जैन दर्शन के अध्येताओं के समक्ष भी वे अपने शोधपत्र प्रस्तुत कर चुके हैं।
अर्पित शाह ने इन तीन रिसर्च पेपर द्वारा प्राचीन हस्तलिखित ग्रंथों, श्वेताम्बर-दिगम्बर जैन ग्रंथों तथा वैदिक ग्रंथों में गहराई से उतरकर ऐसे तथ्य खोज निकाले हैं जो अब तक विद्वत समाज की नजरों से दूर रहे थे।
नालंदा विश्वविद्यालय में उनके द्वारा प्रस्तुत शोधपत्र “ऋषभदेव की विचरण भूमियों के प्राचीन तथा वर्तमान स्थान” एक ऐतिहासिक दस्तावेज है। इस शोध में प्राचीन श्वेताम्बर-दिगम्बर जैन ग्रंथों के साथ वैदिक परंपरा के भागवत पुराण आदि ग्रंथों का समन्वय साधते हुए जैन धर्म के आदि तीर्थंकर ऋषभदेव की विचरण भूमियों की खोज की गई। केवल प्राचीन स्थानों की पहचान ही नहीं, बल्कि वहां घटित महत्वपूर्ण घटनाओं का दस्तावेजीकरण और वर्तमान समय में वे स्थान कहां स्थित हैं, उनकी भौगोलिक पहचान भी इस शोध का हिस्सा थी।
ऋषभायन अंतराष्ट्रीय सेमिनार, मुंबई में प्रस्तुत शोधपत्र “ऋषभदेव की प्राचीन अप्रकाशित आरतियां” साहित्य और संगीत के संगम का अद्भुत उदाहरण है। पिछले 600 से 700 वर्षों में अपभ्रंश, मारुगुर्जर, ब्रज जैसी प्राचीन भाषाओं में गुरुओं, विद्वान पंडितों और श्रद्धालु श्रावकों ने ऋषभदेव की स्तुति में लगभग 15 आरतियों की रचना की थी। ये अमूल्य रचनाएं कोबा (गांधीनगर) आदि ज्ञानभंडारों में हस्तलिखित रूप में सुरक्षित तो थीं, परंतु कभी प्रकाशित नहीं हुईं।
अर्पित शाह ने इन हस्तलिखित प्रतियों का सटीक लिप्यांतरण करवाया और उनकी भाषाशैली, छंदविन्यास, सामान्य अर्थ तथा गूढ़ अर्थों का गहन विश्लेषण किया। इन आरतियों में आदिनाथ के गर्भ-जन्म कल्याणक की आरती, विवाहोत्सव की आरती तथा शत्रुंजय-केसरियाजी जैसे पवित्र तीर्थों के मूलनायक रूप में रची गई आरतियां शामिल हैं। शोध को और अधिक जीवंत बनाने के लिए उन्होंने इनमें से चार आरतियों की संगीतमय कम्पोजिशन भी तैयार की और प्रस्तुति के दौरान उनका गायन भी किया गया।
गुजरात विश्वविद्यालय में प्रस्तुत शोधपत्र “जैन विवाह में पवित्रता की पुनः स्थापना” समकालीन समाज के लिए अत्यंत प्रासंगिक विषय है। आचार्य वर्धमानसूरि विरचित श्वेताम्बर परंपरा के १४वी शताब्दी में रचित प्राचीन “आचार दिनकर” ग्रंथ के आधार पर एक आदर्श विवाह विधि कैसी होनी चाहिए, इसका विस्तृत शोध इस पेपर में प्रस्तुत किया गया। प्रत्येक विधि में उच्चारित मंत्रों के गहन अर्थ और उनके पीछे की दार्शनिक व्याख्या की गई।
इस शोध की विशेषता यह थी कि श्वेताम्बर परंपरा के साथ-साथ दिगम्बर परंपरा और वैदिक परंपरा में प्रचलित विवाह विधि का तुलनात्मक अध्ययन भी किया गया। इसके अलावा, वर्तमान समय में श्वेताम्बर विधिकारकों द्वारा आचार दिनकर ग्रंथ में वर्णित विधि के साथ नई विधियों का समावेश किया जाता है, उसका विवेचनात्मक मूल्यांकन और समीक्षा की गई।
इन तीनों शोधपत्रों में अलग-अलग शास्त्रों का समावेश किया था – इतिहास, साहित्य-संगीत और विधि-विधान जैसे विभिन्न क्षेत्रों में उनकी निपुणता उनकी बहुआयामी विद्वता को प्रतिबिंबित करती है।
अर्पित शाह केवल शोधकर्ता ही नहीं हैं। वे एक लेखक, भक्तिगायक, विधिकारक और विचारक भी हैं। उनके शोधपरक लेखों को विश्वभर के 20 लाख से अधिक पाठक पढ़ चुके हैं।
गुजराती, हिंदी और अंग्रेजी में उनके द्वारा लिखी गई पांच पुस्तकों को जैन आचार्यों के आशीर्वाद के साथ प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी, गुजरात के मुख्यमंत्री श्री भूपेंद्र पटेल, उपमुख्यमंत्री श्री हर्ष संघवी तथा स्वर्गीय पूर्व मुख्यमंत्री श्री विजय रूपाणी के पत्रों द्वारा प्रशंसा मिल चुकी है।
उन्हें “गुरुदेव जंबुविजयजी शताब्दी साहित्य पुरस्कार” और “जैनिक इन्फ्लुएंसर अवार्ड” जैसे प्रतिष्ठित सम्मानों से विभूषित किया जा चुका है।
प्राचीन हस्तलिखित ग्रंथों में छिपे ज्ञान को आधुनिक पीढ़ी तक पहुंचाने का उनका कार्य जैन शास्त्रों के प्रचार-प्रसार के लिए महत्वपूर्ण योगदान है।















