
दुनिया पहले से ही कई युद्धों और तनावों से जूझ रही है, ऐसे में वेनेजुएला और अमेरिका से जुड़ी हाल की खबरों ने वैश्विक चिंता बढ़ा दी है। अमेरिका की सैन्य कार्रवाई और कूटनीतिक दबाव के बीच सवाल उठ रहे हैं कि क्या यह केवल ताकत की राजनीति है या किसी बड़े संघर्ष की शुरुआत।
अमेरिका और वेनेजुएला के रिश्ते पिछले कई वर्षों से तनावपूर्ण रहे हैं। इसकी बड़ी वजह वेनेजुएला की आंतरिक राजनीति, चुनाव प्रक्रिया पर उठे सवाल, मानवाधिकारों के उल्लंघन के आरोप और अमेरिका द्वारा लगाए गए आर्थिक प्रतिबंध हैं। अमेरिका का आरोप है कि वेनेजुएला सरकार लोकतांत्रिक मूल्यों का पालन नहीं कर रही, जबकि वेनेजुएला इसे अपनी संप्रभुता में दखल मानता है।
हाल ही में खबर आई कि अमेरिका ने वेनेजुएला पर सैन्य कार्रवाई की और वहां के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को हिरासत में लिया। अमेरिकी राष्ट्रपति ने भी इस कार्रवाई की पुष्टि की है। अमेरिकी प्रशासन का रुख कूटनीति, दबाव और अंतरराष्ट्रीय सहयोग पर केंद्रित है, न कि खुले युद्ध पर।
विशेषज्ञों का मानना है कि इसे सीधे तीसरे विश्व युद्ध से जोड़ना अभी अतिशयोक्ति होगी। फिलहाल कोई वैश्विक सैन्य गठबंधन युद्ध की घोषणा नहीं कर रहा और बड़े पैमाने पर सैन्य टकराव के संकेत नहीं हैं। हालांकि, क्षेत्रीय संकट अगर बड़े देशों को आमने-सामने लाए तो हालात तेजी से बिगड़ सकते हैं।
संभावित टकराव की स्थिति में अमेरिका को उसके पारंपरिक सहयोगियों और कुछ पश्चिमी देशों का समर्थन मिल सकता है। वहीं, वेनेजुएला को रूस, चीन और कुछ लैटिन अमेरिकी देशों से कूटनीतिक समर्थन मिलने की संभावना है। यह समर्थन अधिकतर राजनयिक और आर्थिक स्तर तक सीमित रहने की उम्मीद है। भारत जैसे देश इस मामले में हमेशा से तटस्थ रहे हैं।
वेनेजुएला तेल उत्पादक देश है, इसलिए वहां अस्थिरता का असर वैश्विक ऊर्जा बाजार पर पड़ सकता है। इसके अलावा, बड़े टकराव से शरणार्थी संकट, व्यापार बाधा और अंतरराष्ट्रीय राजनीति में असंतुलन पैदा हो सकता है। यही कारण है कि दुनिया के कई देश इस पूरे घटनाक्रम पर नजर बनाए हुए हैं और तनाव कम करने की अपील कर रहे हैं।















