तेजस्वी के चुनाव का बहिष्कार करने की धमकी का कोई असर नहीं होगा…कानून जानकारों की स्पष्ट राय

चुनाव आयोग को तय समय पर चुनाव कराना ही होता

नई दिल्ली । बिहार में आगामी विधानसभा चुनाव से पहले मतदाता सूची सुधार की प्रक्रिया यानी स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (एसआईआर) को लेकर राजनीतिक चरम पर है। आरजेडी नेता तेजस्वी यादव ने निर्वाचन आयोग पर पारदर्शिता न बरतने का आरोप लगाकर चुनाव बहिष्कार की धमकी दी है। तेजस्वी का कहना है कि यदि यही स्थिति रही तब ‘महागठबंधन’ चुनाव का बहिष्कार करने पर विचार करेगा।

तेजस्वी ने कहा, “जब चुनाव ईमानदारी से करवाया ही नहीं जा रहा, तब चुनाव में हिस्सा लेने का कोई मतलब नहीं रह जाता है। उनके अनुसार, चुनाव की प्रक्रिया पूरी तरह से समझौता हो चुकी है। उन्होंने सहयोगी दलों से बातचीत कर चुनाव में भाग न लेने का संकेत दिया है।
दरअसल चुनाव आयोग एक संवैधानिक संस्था है, आयोग को अनुच्छेद 324 के तहत निष्पक्ष और स्वतंत्र चुनाव कराने का अधिकार मिला है। सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील के मुताबिक, किसी भी दल के बहिष्कार से चुनाव प्रक्रिया नहीं रुकती। आयोग को तय समय पर चुनाव कराना ही होता है, चाहे उसमें सभी दल हिस्सा लें या न लें।

कानून विशेषज्ञों के अनुसार, तेजस्वी या महागठबंधन के चुनाव बहिष्कार का कोई कानूनी या संवैधानिक प्रभाव नहीं होगा। हां, इससे मतदाताओं के बीच भ्रम पैदा हो सकता है, जिससे मतदान प्रतिशत प्रभावित हो सकता है। लेकिन चुनाव प्रक्रिया में कोई अड़चन नहीं आएगी।

भारत में पहले भी हो चुका है बहिष्कार
जम्मू-कश्मीर (1989-1996): अलगाववादी संगठनों और कुछ राजनीतिक दलों ने बहिष्कार किया, लेकिन चुनाव हुए और सरकारें बनीं।

वहीं मिजोरम (1989): मिजो नेशनल फ्रंट के बहिष्कार के बावजूद कांग्रेस ने सभी सीटें जीतीं।

पंजाब (1991): कांग्रेस ने बहिष्कार किया, पर चुनाव केवल राजीव गांधी की हत्या के चलते टले।

हरियाणा (2014): कुछ क्षेत्रों में पंचायत चुनाव का बहिष्कार हुआ, फिर भी चुनाव हुए।

वहीं बिहार विधानसभा का कार्यकाल नवंबर 2025 में खत्म होने वाला है, और चुनाव अक्टूबर-नवंबर के बीच संभावित हैं। एसआईआर प्रक्रिया 30 सितंबर तक चलेगी। इसके बाद तेजस्वी का यह बयान दबाव बनाने की रणनीति माना जा रहा है। भविष्य में महागठबंधन का असली फैसला ही तय करेगा कि यह सियासी दांव कितना असरदार होगा।

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