टीबी पर सख्ती: पांच लाख से अधिक लोगों की सफल स्क्रीनिंग, 9 हजार से ज्यादा मरीजों का इलाज शुरू….

बहराइच : जिले में टीबी की समय पर और सटीक पहचान के लिए ट्रूनैट मशीन अहम भूमिका निभा रही है। पारंपरिक स्मियर माइक्रोस्कोपी जहां कई मामलों को पकड़ने में नाकाम साबित होती है, वहीं ट्रूनैट मशीन के जरिए टीबी की तेज़ और विश्वसनीय पहचान संभव हो रही है।

जिला क्षय रोग अधिकारी डॉ. एम.एल. वर्मा ने बताया कि माइक्रोस्कोप आधारित जांच की संवेदनशीलता कम होती है, जिसके कारण शुरुआती टीबी, एक्स्ट्रा पल्मोनरी टीबी, एचआईवी और मधुमेह से पीड़ित मरीजों में कई केस छूट जाते हैं। उन्होंने बताया कि पूर्वी उत्तर प्रदेश के एक तृतीयक स्वास्थ्य संस्थान में किए गए हालिया अध्ययन, जिसे इंटरनेशनल जर्नल ऑफ मायकोबैक्टेरियोलॉजी में प्रकाशित किया गया है, में 4,249 फेफड़ों और अन्य अंगों के नमूनों की जांच की गई। इसमें माइक्रोस्कोपी केवल 4.3 प्रतिशत मामलों में ही टीबी की पहचान कर सकी, जबकि ट्रूनैट जांच से 13.7 प्रतिशत मामलों में टीबी की पुष्टि हुई। इससे स्पष्ट है कि ट्रूनैट अधिक भरोसेमंद और सटीक तकनीक है।

उन्होंने बताया कि जनवरी 2025 से नवंबर 2025 के बीच जिले में लगभग पांच लाख लोगों की स्क्रीनिंग की गई। इस दौरान करीब 95 हजार एक्स-रे और 52 हजार से अधिक सैंपल ट्रूनैट मशीन से जांचे गए। लगातार की जा रही इन उन्नत जांचों के चलते जिले में नौ हजार से अधिक टीबी मामलों का नोटिफिकेशन हुआ, जिससे मरीजों को समय पर इलाज मिल सका और संक्रमण के फैलाव पर रोक लगाने में मदद मिली।

ट्रूनैट मशीन दो घंटे में देती है रिपोर्ट
मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ. संजय शर्मा ने बताया कि जिले के सभी 14 सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों पर ट्रूनैट मशीनें स्थापित हैं, जिनसे हर माह औसतन 6 से 7 हजार जांचें की जा रही हैं। निजी चिकित्सकों को भी मरीजों को ट्रूनैट जांच के लिए रेफर करने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है, जिससे लोगों को नि:शुल्क और सटीक जांच सुविधा मिल रही है।

उन्होंने बताया कि ट्रूनैट मशीन दो से ढाई घंटे के भीतर रिपोर्ट उपलब्ध करा देती है और दवा प्रतिरोध की स्थिति की भी जानकारी देती है, जिससे समय पर सही उपचार शुरू हो पाता है। ट्रूनैट सुविधा और बड़े पैमाने पर स्क्रीनिंग अभियान के चलते जिले में टीबी नियंत्रण की स्थिति मजबूत हुई है।

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