Sitapur : रंपा महल के तालों की चाबियों में उलझी गुत्थी

  • कानपुर से लौटीं मनोरमा शुक्ला के सनसनीखेज आरोप
  • तहसीलदार ने दावों को किया सिरे से खारिज
  • क्या वाकई खुद सौंपी गई थीं चाबियां, या कैमरे के सामने रचा गया महज एक स्वांग?
  • रंपा महल की मालकिन ने लगाई मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से न्याय की गुहार

Sitapur : शहर के ऐतिहासिक रंपा महल की दीवारों के भीतर जो कुछ हुआ, उसने अब एक बड़े सियासी और कानूनी बखेड़े का रूप ले लिया है। बीते 9 जनवरी को जिस रंपा महल को प्रशासन ने ‘शांतिपूर्ण’ तरीके से खाली कराने का दावा किया था, उसकी असलियत अब सवालों के घेरे में है। महल की मालकिन मनोरमा शुक्ला ने सामने आकर तहसील प्रशासन की कार्यशैली की धज्जियां उड़ा दी हैं।

मनोरमा का साफ कहना है कि जब वह अपने भाई के निधन पर कानपुर गई हुई थीं, तब पीछे से प्रशासन द्वारा की गई कार्रवाई ने सारी हदें पार कर दीं। उनका सीधा सवाल है कि जब रंपा महल की चाबियां उनके पास थीं, तो तहसीलदार अतुल सिंह ने मीडिया के सामने कौन सी चाबियां दिखाकर दावा किया कि उन्हें कब्जा मिल गया है? उन्होंने कहा कि रंपा महल का सौ साल का पट्टा है, जो अभी पूरा नहीं हुआ है, वहीं प्रशासन का कहना है कि पट्टा निरस्त कर दिया गया है।

मनोरमा शुक्ला ने आरोप लगाया है कि प्रशासन ने न केवल उनकी गैर-मौजूदगी का फायदा उठाया, बल्कि उनकी ननद और वहां रह रहे किराएदारों के साथ बेरहमी से मारपीट भी की। आलम यह है कि घर का सामान बाहर फेंक दिया गया और परिवार को बेघर कर दिया गया। उनकी ननद ने आपबीती सुनाते हुए बताया कि तहसील की टीम ने जबरदस्ती उनके हाथों में चाबियां थमाईं, फोटो खिंचवाए और दबाव बनाकर कागजों पर हस्ताक्षर करवा लिए। मंदिर के पुजारी ने भी प्रशासन पर गंभीर प्रहार करते हुए मारपीट की बात कही। मनोरमा अब इस पूरे मामले को लेकर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से न्याय की गुहार लगा रही हैं।

दावों और प्रतिदावों की रार, आखिर कौन छिपा रहा है सच का चेहरा?

दूसरी ओर, तहसीलदार अतुल सिंह इन तमाम आरोपों को बेबुनियाद और मनगढ़ंत बता रहे हैं। उनका तर्क है कि जब वह अन्य स्थानों पर सिर्फ अल्टीमेटम देकर काम चला रहे हैं, तो रंपा महल के साथ पक्षपात या हिंसा क्यों करेंगे? प्रशासन का स्टैंड अभी भी वही है कि चाबियां स्वेच्छा से सौंपी गई थीं।

लेकिन रंपा महल की मालकिन के पलटवार ने इस कहानी में शर्म-शर्माश और सस्पेंस दोनों भर दिया है। अब यह मामला सिर्फ “मैं-मैंश्” से आगे बढ़कर जांच के घेरे में पहुंचता दिख रहा है। चाबियों की यह गुत्थी सुलझने के बजाय और उलझ गई है, और शहर में चर्चा आम है कि आखिर उस दिन रंपा महल के बंद दरवाजों के पीछे असली खेल क्या हुआ था।

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