चाय की सिप बना रही है बीमार, अनजाने में पी रहें खतरनाक केमिकल

Health : झारखंड के पलामू में लाखों चाय-प्रेमी अनजाने में गंभीर बीमारियों की ओर बढ़ रहे हैं। पलामू जिला ही नहीं, बल्कि पूरे देश के कई हिस्सों में कागज के कप (पेपर कप) में चाय पीने का चलन तेजी से बढ़ रहा है। लोग इसे स्वच्छ और सुरक्षित मानकर इसका इस्तेमाल कर रहे हैं, लेकिन विशेषज्ञों के अनुसार यह आदत धीरे-धीरे शरीर में जहर घोलने जैसी है। कोरोना काल के दौरान स्वच्छता और सुविधा के नाम पर पेपर कप का प्रचलन बढ़ा, लेकिन अब यह एक गंभीर स्वास्थ्य संकट का रूप ले चुका है।

पलामू सहित देश के कई हिस्सों में पेपर कप में चाय पीने का चलन बढ़ रहा है, लेकिन यह स्वास्थ्य के लिए बेहद खतरनाक साबित हो सकता है। गर्म पेय के संपर्क में आने पर कप की परत से माइक्रो-प्लास्टिक के कण घुल जाते हैं, जो शरीर में प्रवेश कर हार्मोनल असंतुलन, तंत्रिका तंत्र संबंधी बीमारियों और कैंसर का खतरा बढ़ाते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि यह आदत धीरे-धीरे शरीर में जमे इन सूक्ष्म कणों के कारण गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं को जन्म दे सकती है।

प्रतिदिन जिले में लाखों पेपर कप का उपयोग होता है। यदि कोई व्यक्ति दिन में तीन से चार बार पेपर कप में चाय पीता है, तो उसके शरीर में लगभग 75,000 माइक्रोप्लास्टिक कण हर दिन प्रवेश कर सकते हैं। इन सूक्ष्म कणों का असर तुरंत नहीं दिखता, लेकिन धीरे-धीरे यह शरीर में जमा होकर हार्मोनल असंतुलन, नर्वस सिस्टम से जुड़ी बीमारियों और लंबे समय में कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों का कारण बन सकते हैं।

चिकित्सकों का कहना है कि अधिकांश पेपर कप पर की गई केमिकल या प्लास्टिक कोटिंग को सामान्य उपभोक्ता आसानी से पहचान नहीं सकता। अधिकतर कप के अंदर पॉलीइथिलीन या अन्य केमिकल की पतली परत होती है, जो गर्म पेय के संपर्क में आने पर टूटने लगती है और माइक्रो-प्लास्टिक के कणों में बदल जाती है। विशेषज्ञों का सुझाव है कि स्टील, कांच या चीनी मिट्टी के कप सबसे सुरक्षित विकल्प हैं, क्योंकि यह न केवल स्वास्थ्य के लिए बेहतर हैं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण के लिहाज से भी जरूरी हैं।

शहर में कोरोना से पहले तक अधिकांश होटल, रेस्टोरेंट और चाय की दुकानों में स्टील और कांच के गिलास ही इस्तेमाल होते थे। अब उनकी जगह डिस्पोजेबल पेपर कप ने ले ली है। व्यापारियों के अनुसार, शहर में रोजाना लाखों पेपर कप का इस्तेमाल हो रहा है। एक छोटी चाय दुकान या ठेला दिनभर में 250 से 300 कप तक का उपयोग कर लेता है। अभी शहर की लगभग 10 प्रतिशत चाय दुकानों में ही स्टील, कांच या कुल्हड़ में चाय परोसी जाती है, जबकि अधिकांश दुकानों में सिंगल यूज पेपर कप का चलन है।

क्या है कारण और खतरा? पेपर कप को लीक-प्रूफ बनाने के लिए इसके अंदर हाइड्रोफोबिक फिल्म (जैसे पॉलीइथिलीन) की परत लगाई जाती है। जब इसमें गर्म चाय या कॉफी डाली जाती है, तो यह परत टूटकर माइक्रो-प्लास्टिक के कणों में बदल जाती है, जो सीधे पेय में मिल जाते हैं। अनुमान है कि एक पेपर कप से करीब 25,000 माइक्रोप्लास्टिक कण शरीर में पहुंच सकते हैं। यदि रोजाना तीन कप चाय पी जाए, तो यह संख्या 75,000 प्रति दिन और एक महीने में 20 लाख से अधिक हो सकती है। इससे कैंसर, हार्मोनल असंतुलन और नर्वस सिस्टम पर गंभीर प्रभाव पड़ने का खतरा है।

इसके अलावा, पेपर कप का पर्यावरण पर भी गहरा असर है। ये आसानी से नष्ट नहीं होते, वर्षों तक कूड़े के ढेर में पड़े रहते हैं। जलाने पर वायु प्रदूषण फैलाते हैं और मिट्टी व जल स्रोतों को भी प्रदूषित करते हैं।

सीएस डॉ. अनिल कुमार श्रीवास्तव का कहना है कि अधिकांश पेपर कप पर लगी कोटिंग में मोम भी होता है, जो स्वास्थ्य के लिहाज से ठीक नहीं है। जब गरम पेय इसमें डाला जाता है, तो मोम पिघलने लगता है और शरीर में प्रवेश कर जाता है, जिससे किडनी और लीवर पर बुरा असर पड़ता है। इसलिए, चाय, कॉफी या किसी भी गरम पेय को कुल्हड़, कांच या स्टील के गिलास में ही पीना बेहतर है।

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