
Prayagraj : कोरांव तहसील का मामला है। शुक्रवार को एसडीएम अपने कक्ष में अधिवक्ताओं और फरियादियों की जनसुनवाई कर रहे थे। इसी बीच रजिस्ट्रार कानूनगो कुछ सरकारी फाइलें लेकर हस्ताक्षर कराने पहुंचे। उसी दौरान कानूनगो ने कहा कि साहब, जो लेखपाल मेरे साथ ऑफिस में अटैच हैं, वे ऑफिस में काम न करके फील्ड में काम करना चाहते हैं।
एसडीएम ने कहा, “बुलाओ।” जब लेखपाल साहब आए तो एसडीएम ने पहले उन्हें खरी-खोटी सुनाई और वेतन रोकने के निर्देश दिए। लेकिन वेतन भुगतान का पेपर पहले ही भेजा जा चुका था।
तब लेखपाल ने कहा, “सर, पीसीएस मेन्स परीक्षा का यह मेरा अंतिम अवसर है। कृपया मुझे फील्ड में नियुक्त कर दीजिए, ताकि मैं पढ़ाई भी कर सकूं। ऑफिस में बहुत ज्यादा काम रहता है, शाम तक काम करना पड़ता है, इसलिए पढ़ाई की तैयारी नहीं कर पा रहा हूं।”
एसडीएम ने कुछ शर्तों के साथ फील्ड में रखने की बात कही। लेकिन दर्जनों अधिवक्ताओं और आम जनता के बीच लेखपाल फफक-फफक कर रोने लगा, उसकी आंखों से आंसू बहने लगे और वह एसडीएम कक्ष से बाहर चला गया।
इसी बीच कोसफरा गांव के जयकरण प्रसाद और दूसरे पक्ष निजामुद्दीन निवासी कोसफरा का जमीनी मामला काफी दिनों से लंबित है। दोनों पक्षों के अधिवक्ताओं में चेंबर में ही कहासुनी और नोकझोंक हो गई। कुछ वरिष्ठ अधिवक्ताओं के हस्तक्षेप के बाद मामला शांत हुआ।
इसी प्रकार एक अधिवक्ता ने कहा कि इटवा खुर्द स्टांप जांच चार महीने से लंबित है, लेकिन आज तक श्रीमान द्वारा नहीं की गई, जिसके कारण निस्तारण नहीं हो पा रहा।
कैम्पस में शौचालय की सफाई का अकाल
तहसील के अंदर बने सार्वजनिक और स्टाफ के शौचालय क्रियाशील नहीं हैं। गंदगी, बदबू और दुर्गंध का अंबार है। गेट और खिड़कियां टूटी हुई हैं, पानी की सप्लाई नहीं है। यदि किसी को शौच जाना हो तो तहसील में व्यवस्था नहीं है। जबकि लाखों रुपये साफ-सफाई और रखरखाव के नाम पर खर्च किए जाते हैं, लेकिन व्यवस्था बदहाल है।

तहसील कैम्पस बना ताल-तलैया
तहसील कोरांव के कैम्पस में पानी भरा हुआ है, जिसके कारण वाहनों को सड़कों पर खड़ा करना पड़ता है। चार पहिया या अन्य बड़े वाहन आने पर मोटरसाइकिल हटाने को लेकर आए दिन झड़प होती रहती है। कैम्पस में पानी भराव के कारण वाहन खड़ा नहीं हो पाता। जल निकासी की व्यवस्था नहीं है।
कुछ दिन पहले एक गाय कैम्पस में रखे जनरेटर के करंट की चपेट में आ गई थी और तड़पती रही। जब जनरेटर बंद हुआ, तब जाकर जान बची। बेजुबान पशुओं का तहसील में जमावड़ा लगा रहता है, लेकिन तहसील के जिम्मेदार अधिकारियों का ध्यान इस ओर नहीं जा रहा।

कदम-कदम पर होती है अवैध वसूली
कई फरियादियों और अधिवक्ताओं ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि बिना सुविधा शुल्क दिए किसी टेबल पर काम आगे नहीं बढ़ता। जबकि सरकार जीरो टॉलरेंस की नीति पर काम कर रही है, लेकिन सरकारी कर्मचारी अपने वेतन से संतुष्ट नहीं हैं। गरीब, निरीह मजदूर और हर तबके के लोगों से बिना सुविधा शुल्क लिए उनका काम नहीं होता। तहसील दफ्तर के चक्कर लगाते रहते हैं, लेकिन कोई अधिकारी यह नहीं सोचता कि हम निःस्वार्थ भाव से सरकार की नीति के अनुसार काम करें ताकि सरकार की स्वच्छ छवि आम लोगों के बीच बने।
निर्धारित सरकारी शुल्क के अलावा लिया जाता है अतिरिक्त शुल्क
कई किसानों ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि तहसील कोरांव में खतौनी लेने के लिए अतिरिक्त सुविधा शुल्क देना पड़ता है। प्रति खतौनी 15 रुपये शुल्क निर्धारित है, लेकिन यहां 20 रुपये प्रति खतौनी लिया जाता है। एक दिन में सैकड़ों खतौनियां निकलती हैं। सवाल यह है कि यह अतिरिक्त राशि आखिर जाती कहां है और इसका जिम्मेदार कौन है? यह जांच का विषय है।











