
उत्तराखंड : हरिद्वार से उठ रही एक मांग ने पूरे उत्तराखंड की राजनीति और धार्मिक विमर्श को एक बार फिऱ से केन्द्र में ला खडा कर दिया है. बता दें कि वर्ष 2027 में प्रस्तावित कुंभ मेले से पहले कुंभ क्षेत्र में गैर-हिंदुओं के प्रवेश पर प्रतिबंध लगाने की मांग ने सियासी और सामाजिक हलकों में तीखी बहस छेड़ दी है। यह मांग गंगा सभा और संत समाज के एक वर्ग की ओर से सामने आई है, जिस पर मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने भी गंभीरता से विचार किए जाने की बात कही है।
गंगा सभा, जो हर-की-पौड़ी घाट के रखरखाव की जिम्मेदारी निभाती है, उनका कहना है कि सनातन आस्था और गंगा की पवित्रता को बनाए रखने के लिए कुंभ क्षेत्र और प्रमुख घाटों पर गैर-हिंदुओं के प्रवेश पर पाबंदी लगाई जानी चाहिए। वहीं …गंगा सभा के अध्यक्ष नितिन गौतम ने दावा किया है कि वर्ष 1916 में ब्रिटिश शासनकाल के दौरान बनाए गए नगर पालिका बायलॉज आज भी प्रभावी हैं, जिनमें हर-की-पौड़ी सहित कई घाटों पर गैर-हिंदुओं के प्रवेश को प्रतिबंधित किया गया है। उनके अनुसार, यह मांग किसी समुदाय के खिलाफ नहीं बल्कि धार्मिक स्थलों की पवित्रता और सुरक्षा बनाए रखने से जुड़ी हुई है।…वहीं अस पूरे प्रकरण पर संत समाज के कई प्रतिनिधियों ने भी इस मांग का समर्थन किया है। संतों का तर्क है कि जैसे मक्का-मदीना में गैर-मुस्लिमों का प्रवेश वर्जित है, उसी तरह कुंभ नगरी जैसे पवित्र तीर्थ क्षेत्र में भी धार्मिक मर्यादाओं का पालन होना चाहिए। उनका कहना है कि यह केवल आस्था का नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पहचान और परंपरा का भी सवाल है।

इस पूरे मुद्दे पर मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने कहा है कि हरिद्वार ऋषि-मुनियों की भूमि रही है और वहां की पवित्रता बनाए रखना सरकार की प्राथमिकता है। मुख्यमंत्री के मुताबिक, सरकार पुराने नगर पालिका एक्ट और बायलॉज का अध्ययन कर रही है और सभी पहलुओं को ध्यान में रखते हुए आगे की कार्रवाई पर विचार किया जाएगा, ताकि धार्मिक मान्यताओं और कानून-दोनों का संतुलन बना रहे।
वहीं विपक्ष इस पूरे मुद्दे पर बहते गंगा के पानी में हाथ धोने का काम कर रही है..और सरकार पर सवाल उठा रही है यहां हम बात कर रहे हैं कांग्रेस विधायक काज़ी निज़ामुद्दीन की जिन्होने इसे जनता का ध्यान मूल मुद्दों से भटकाने की कोशिश बताया है। उनका कहना है कि बेरोज़गारी, पेपर लीक, अतिक्रमण और अन्य गंभीर समस्याओं से ध्यान हटाने के लिए इस तरह के पुराने मुद्दों को फिर से उछाला जा रहा है, जबकि मौजूदा व्यवस्था को सभी पहले से ही स्वीकार करते आए हैं। बता दें कि नगर पालिका हरिद्वार के बायलॉज में साफ तौर पर उल्लेख है कि हर-की-पौड़ी और अन्य गंगा घाटों पर गैर-हिंदुओं का प्रवेश प्रतिबंधित है और उल्लंघन की स्थिति में जुर्माने का प्रावधान भी है। नगर निगम अधिकारियों का कहना है कि ये नियम धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि विधिक रूप से स्वीकृत नगरपालिका उपविधियां हैं, जिन्हें स्थानीय परिस्थितियों को देखते हुए लागू किया गया था।

फिलहाल यह मुद्दा हरिद्वार से निकलकर पूरे उत्तराखंड में चर्चा का विषय बना हुआ है। 2027 के कुंभ मेले से पहले इस मांग और सरकार के रुख पर सभी की निगाहें टिकी हैं, क्योंकि आने वाले समय में यह फैसला न केवल धार्मिक आयोजन की रूपरेखा तय करेगा, बल्कि राज्य की राजनीति और सामाजिक माहौल की दिशा भी निर्धारित कर सकता है।
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