
बारिश को सालाना मिलने वाले लाभ में बदलने के लिए भारत में परिपूर्ण दृष्टिकोण जरूरी है
नई दिल्ली, 29 अगस्त 2025 : भारत में मॉनसून की सबसे अहम भूमिका है। देश में 70 प्रतिशत बारिश दक्षिण पश्चिम मॉनसून के कारण होती है, जिससे हमारी 4 ट्रिलियन डॉलर से अधिक की अर्थव्यवस्था को लाभ मिलता है। लेकिन जलवायु परिवर्तन के कारण मॉनसून पर भी असर पड़ा है। इससे किसानों, शहरी योजनाकारों तथा पूरे परिवेश के लिए समृद्धि लाने वाली बारिश अनिश्चित हो गई है। जिसके कारण, कहीं पर तो भारी बाढ़ भयंकर तबाही ला रही है, तो उसी समय कहीं पर सूखे के कारण फसल बर्बाद हो रही है। इसके बाद भी भारत में बारिश का अधिकांश जल बहकर बर्बाद हो जाता है, जिसका कारण है, संरचनागत उपायों की कमी। जलनिकासी की उचित व्यवस्था न होना, मिट्टी का अनियंत्रित कटाव, और रेनवॉटर हार्वेस्टिंग की अपर्याप्त व्यवस्था स्थिति को अनियंत्रित बना देते हैं। भारत के शहरों में कॉन्क्रीट संरचनाएं पानी को रिसकर जमीन में जाने से रोक देती हैं। इसलिए शहरों में बारिश का पानी न तो जमीन में पहुँच पाता है और न ही सही तरह से उसकी निकासी हो पाती है। परिणामस्वरूप, कहीं पर जलभराव हो जाता है, तो कहीं पर पानी के कारण यातायात व्यवस्था ठप्प पड़ जाती है।
यशोवर्धन अगरवाल, एम.डी.,वेल्स्पन बीएपीएल ; डायरेक्टर, सिंटेक्स के अनुसार, “भूमिगत जल उपयोग के मामले में भारत दुनिया में सबसे ऊँचे पायदान पर है, जहाँ 25 प्रतिशत वैश्विक भूमिगत जल का उपयोग कर लिया जाता है। कृषि एवं सहयोगी गतिविधियाँ, खासकर उच्च पैदावार देने वाली फसलें, जिनमें चावल और गन्ना शामिल हैं, भूमिगत जल के ऊपर दबाव को और अधिक बढ़ा देती हैं। हालाँकि पिछले 4 सालों में महाराष्ट्र में नीतिगत उपायों द्वारा भूमिगत जल के उपयोग में 1.84 प्रतिशत की कमी आई है। बारिश के पानी को सालाना मिलने वाले लाभ में बदलने के लिए भारत में व्यवहारिक उपाय किए जाने आवश्यक हैं, जिनमें शामिल हैं”।
आधुनिक जल संचयन, वॉटर रिचार्ज
शहरों एवं गाँवों में सतही जल निकासी प्रणाली और जल भंडारण एवं जल संचयन प्रणालियाँ काम कर रही हैं। ये प्रणालियाँ बारिश के जल को बाढ़-संभावित क्षेत्रों में भंडारण एवं भूमिगत जल संचयन के लिए भेज रही हैं, जिससे जलभराव एवं मिट्टी के कटाव में कमी आई है। यदि क्षेत्र-स्तर पर वैज्ञानिक उपायों के साथ इनका उपयोग किया जाए, तथा चेक डैम और रिचार्ज वैल स्थापित किए जाएं, तो ये प्रणालियाँ बारिश के अधिकांश जल का भंडारण आने वाले महीनों के लिए कर सकती हैं।
फिल्ट्रेशन के साथ रेनवॉटर हार्वेस्टिंग
रेनवॉटर हार्वेस्टिंग द्वारा पानी छनकर, उसमें से गाद बाहर निकल जाती है, और जमीन के अंदर केवल शुद्ध जल रिसकर पहुंचता है, जिसमें पेस्टिसाईड या फर्टिलाईज़र्स से निकलने वाले कैमिकल्स नहीं होते हैं। इससे भूमिगत जलभंडार आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित बनते हैं। हाल ही में खंडवा में जल शक्ति जन भागीदारी अभियान के अंतर्गत जल अवसंरचना के विकास से यह सफलता प्रदर्शित होती है। इसके अंतर्गत 1.29 लाख से अधिक जल संरक्षण संरचनाओं का निर्माण किया गया।
डिसैलिनेशन (खारे जल को मीठा बनाना)
जल की कमी वाले तथा तटीय इलाकों में डिसैलिनेशन प्लांट (खारे जल को मीठा बनाने वाले संयंत्र) पेयजल को छोड़कर अन्य उपयोगों के लिए जल की कमी को पूरा कर रहे हैं। नई डिसैलिनेशन एवं फिल्ट्रेशन तकनीकों द्वारा खारे जल को पीने योग्य बनाने में मदद मिल रही है, जिससे ग्रामीण और शहरी समुदायों के लिए जल के विकल्प बढ़ रहे हैं।
नीति, क्रियान्वयन
कुछ राज्य सरकारों और नगर निगमों ने नई संरचनाओं के विकास के लिए रेनवॉटर हार्वेस्टिंग को अनिवार्य बना दिया है। पर अब इस दिशा में एक समान राष्ट्रीय नीति लागू किए जाने की जरूरत है। सभी विकासाधीन और इन्फ्रास्ट्रक्चर की परियोजनाओं में रेनवॉटर हार्वेस्टिंग और रिचार्ज सिस्टम को शामिल किया जाना भारत में जल सुरक्षा के लिए अत्यंत आवश्यक है। इसके क्रियान्वयन के साथ शिक्षा व प्रोत्साहन दिए जाने की भी आवश्यकता है, ताकि ये प्रणालियाँ केवल स्थापित ही न हों, बल्कि लंबे समय तक उनका रखरखाव और उनमें सुधार भी होता रहे।
खंडवा में रेनवॉटर हार्वेस्टिंग की सफलता तथा ताप्ती मेगा रिचार्ज परियोजना, जिसे दुनिया की सबसे बड़ी भूमिगत जल रिचार्ज परियोजना के रूप में देखा जा रहा है, इन दोनों ने स्थानीय, राज्य और केंद्र की सरकारों के लिए जल प्रबंधन के क्षेत्र में योजना व क्रियान्वयन के ऊँचे मानक स्थापित कर दिए हैं।
अब समय है, कदम उठाने का। इसलिए चलिए हम बातों से आगे बढ़कर संकल्पबद्ध हों तथा नीति को अमल में लाकर सुनिश्चित करें कि इस साल हम बारिश के जल की एक बूंद भी बर्बाद नहीं होने देंगे।