
Maharashtra : महाराष्ट्र में हाल ही में संपन्न निकाय चुनावों ने सियासी गलियारों में भूचाल ला दिया है। भाजपा की आंधी में ठाकरे परिवार और पवार फैमिली का किला ढह चुका है, और अब भाजपा पहली बार बीएमसी में मेयर पद पर काबिज हो गई है। यह जीत न केवल शिवसेना के लिए बड़ा झटका है, बल्कि पवार परिवार के लिए भी एक बड़ा संकट लेकर आई है।
पुणे और पिंपरी-चिंचवाड़ में भाजपा ने शानदार प्रदर्शन करते हुए दोनों नगर निगमों में अपने झंडे गाड़ दिए। देवेंद्र फडणवीस की रणनीति और मेहनत से यह साबित हो गया है कि महाराष्ट्र में भाजपा अपनी पकड़ मजबूत कर रही है। इस चुनाव में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) के दो गुट – शरद पवार की एनसीपी (SP) और उनके भतीजे अजित पवार की एनसीपी – दोनों ही बुरी तरह हार गए।
यह पहली बार नहीं है जब महाराष्ट्र में भाजपा का वर्चस्व बढ़ा है, लेकिन इस बार का परिणाम खासतौर पर पवार फैमिली के लिए बड़ा झटका है। 2023 में अजित पवार ने चाचा शरद पवार वाली एनसीपी से बगावत कर महायुति में शामिल होकर डिप्टी सीएम का पद संभाला था। उस समय दोनों गुट अलग थे, लेकिन इस बार चुनाव में राजनीतिक मजबूरी के कारण एक बार फिर साथ आए।
पुणे और पिंपरी-चिंचवाड़ क्षेत्र, जिन्हें सदियों से पवार परिवार का गढ़ माना जाता रहा है, अब भाजपा ने सेंध लगा दी है। परिणामों ने साबित कर दिया है कि पवार फैमिली का यह गढ़ ध्वस्त हो चुका है। शरद पवार की एनसीपी 24 नगर निगमों में से एक भी सीट नहीं जीत सकी, जबकि अजित पवार की एनसीपी भी महायुति के प्रत्याशियों के खिलाफ लड़कर पूरी तरह से धराशाई हो गई। केवल अहिल्यानगर में भाजपा के साथ गठबंधन कर अजित पवार की पार्टी को थोड़ी जीत मिली, लेकिन उसका कोई बड़ा महत्व नहीं है।
अजित पवार के लिए स्थिति और भी जटिल हो गई है। वह वर्तमान में महायुति सरकार में डिप्टी सीएम हैं, जिसमें भाजपा और शिवसेना (शिंदे गुट) उनके सहयोगी हैं। लेकिन इस चुनाव में उन्होंने भाजपा के खिलाफ उम्मीदवार उतारे, भाजपा पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए, और जोर-शोर से भाजपा विरोधी प्रचार किया। इससे भाजपा नेताओं में नाराजगी और असंतोष व्याप्त हो गया है। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष रवींद्र चव्हाण ने यहां तक कह दिया है कि अजित पवार को साथ लेने का उन्हें अफसोस है।
अब चुनाव के परिणामों के बाद, अजित पवार के सामने नई चुनौतियां खड़ी हो गई हैं। उनकी भूमिका पहले जैसी नहीं रह पाएगी, क्योंकि भाजपा अब महाराष्ट्र में और मजबूत हो रही है। शिंदे गुट का भाजपा के साथ गठबंधन और उसकी बढ़ती लोकप्रियता, दोनों मिलकर उनके राजनीतिक भविष्य को संदिग्ध बना रहे हैं।
क्या अजित पवार फिर से अपने पुराने गढ़ को पुनः मजबूत कर पाएंगे, या भाजपा के दबाव में झुकेंगे, यह भविष्य के गर्भ में है। फिलहाल, उनके लिए सबसे बड़ा सवाल यह है कि वे इस हार के बाद क्या कदम उठाएंगे और अपनी राजनीतिक रणनीति कैसे तय करेंगे।
महाराष्ट्र की राजनीति में इस चुनाव का परिणाम स्पष्ट संकेत है कि भाजपा अब प्रदेश की मुख्य शक्ति बनकर उभरी है, और पवार परिवार को अपने राजनीतिक वर्चस्व को पुनः स्थापित करने के लिए नई रणनीतियों की जरूरत होगी।
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