
Maharajganj : नवंबर माह में धान की कटाई लगभग अंतिम चरण में पहुंच गई है। अर्से बाद एक बार फिर पुराने जमाने की याद आने लगी है। जिलाधिकारी संतोष कुमार शर्मा की शानदार पहल से खेत–खलिहानों में पराली की पुरवट नजर आने लगी है। गांव के खेत–खलिहानों में पुआल की पुरवटों की भरमार हो गई है। किसान पुआल बेचकर अच्छी कमाई भी करने लगे हैं। दैनिक भास्कर की टीम महराजगंज जनपद के कई गांवों में पहुंची। पराली की समस्या और उसके समाधान पर सिलसिलेवार तरीके से बात की। किसानों के मन को उकेरा। पुराने जमाने की यादें ताजा हो गईं।
किसान ओमप्रकाश ने कहा कि बाबू! पहले जमाने में बैलों की जोड़ी से धान की मड़ाई होती थी। अगहन और पौष के महीने में खलिहान गुलजार रहते थे। अमीर हो या कम जोत वाले किसान सभी के दिन–रात खलिहानों में ही गुजरते थे। पराली की पुरवटों की भरमार होती थी। यही पुआल ठंड के महीने में आग बनकर गर्माहट देता था और सालभर पशुओं के चारे में उपयोग होता था। लेकिन कुछ सालों में यह परंपरा विलुप्त हो गई। आधुनिकता आई और कंबाइन हार्वेस्टर से धान कटने लगा, जिससे खेतों में पराली की समस्या गंभीर रूप लेती गई। लेकिन अब एक बार फिर पुराने जमाने जैसे खलिहानों में पराली की पुरवटें दिखने लगी हैं।
डीएम के प्रयास से बदली किसानों की सोच
दैनिक भास्कर की टीम ने किसान भैंसी गांव के मार्कंडेय पांडेय, महदेईया गांव के श्यामसुंदर वर्मा और बासपार नुतन गांव के उत्तम सिंह से बातचीत की। किसानों के चेहरों पर जहां पराली की समस्या को लेकर चिंता दिखी, वहीं जिलाधिकारी संतोष कुमार शर्मा के प्रयासों का असर भी साफ नजर आया।
किसानों ने कहा कि “ऐसे डीएम पहली बार देखे, जो घर–घर जाकर पराली जलाने से होने वाले नुकसान को बारीकी से समझाते हैं। पराली से होने वाले लाभ भी बताते हैं। उनकी बात मन को भा गई, इसलिए चारों ओर पुआल की पुरवटें दिख रही हैं।
किसानों ने बताया कि अब खलिहानों में पुआल की डिमांड भी बढ़ गई है। पराली खरीदने वालों की भीड़ आने लगी है। डीएम की इस शानदार पहल से पुरानी यादें फिर ताजा हो गईं।
किसान प्रमोद कुमार, रवीन्द्र नाथ, संजय पटेल और विधि नारायण पटेल ने कहा कि हम दो साल से पराली नहीं जला रहे हैं। इसका असर यह हुआ कि फसलों में कोई रोग नहीं लगा। गेहूं का उत्पादन रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचा। फास्फेटिक खाद की लागत भी कम हुई।
पुआल जलाने से खेत की मिट्टी में मौजूद मित्र और शत्रु दोनों तरह के कीट मर जाते हैं, जबकि इन्हीं कीटों से फसल का बेहतर उत्पादन मिलता है। पुआल जलने से रोकने के लिए सभी को मिलकर सामूहिक प्रयास करना चाहिए। जिला प्रशासन पूरा सहयोग कर रहा है और किसानों को भी साथ देना होगा। किसानों ने कहा कि पराली जलाने से अच्छा है कि उसे सड़ाकर खाद बनाएं। इससे गेहूं का उत्पादन बढ़ेगा और खेतों की लागत भी कम आएगी।












