
सुप्रीम कोर्ट में बिहार में विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर चल रही सुनवाई के दौरान उस वक्त हैरानी का माहौल बन गया, जब चर्चा अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप तक जा पहुंची। दरअसल, वोटर लिस्ट संशोधन प्रक्रिया पर सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं ने अंतरराष्ट्रीय उदाहरणों का हवाला दिया, जिसके जवाब में चुनाव आयोग की ओर से अमेरिका की न्याय व्यवस्था और वहां की राजनीतिक परिस्थितियों का उल्लेख किया गया।
सुनवाई की शुरुआत बिहार में चल रही मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर हुई। याचिकाकर्ताओं का आरोप था कि इस प्रक्रिया के तहत बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम मनमाने ढंग से हटाए जा सकते हैं, जिससे उनके लोकतांत्रिक अधिकार प्रभावित होंगे। इस दलील को मजबूत करने के लिए याचिकाकर्ताओं ने अमेरिका समेत अन्य देशों के न्यायिक उदाहरण कोर्ट के सामने रखे।
हालांकि, चुनाव आयोग ने इन तर्कों पर कड़ी आपत्ति जताई। आयोग की ओर से पेश वकील ने कहा कि अमेरिका या अन्य देशों की परिस्थितियों की तुलना भारत से नहीं की जा सकती। इसी दौरान अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का नाम सामने आया। चुनाव आयोग के वकील ने कोर्ट को बताया कि अमेरिका में ट्रंप द्वारा ग्रीनलैंड को लेकर दिए गए बयान, नाटो पर आक्रामक टिप्पणियां और वेनेजुएला जैसे मामलों में हस्तक्षेप, वहां की अलग राजनीतिक और न्यायिक परिस्थितियों को दर्शाते हैं।
चुनाव आयोग ने स्पष्ट किया कि भारत की चुनावी प्रक्रिया पूरी तरह संविधान और कानून के दायरे में संचालित होती है। आयोग ने कहा कि अनुच्छेद 324 और जन प्रतिनिधित्व अधिनियम के तहत मतदाता सूची की शुद्धता सुनिश्चित करना उसकी संवैधानिक जिम्मेदारी है। ऐसे में विदेशी उदाहरणों को भारत की संवैधानिक व्यवस्था पर लागू करना उचित नहीं है।
इस तरह बिहार के SIR पर सुनवाई के दौरान चर्चा का दायरा भारत से निकलकर अमेरिका, वेनेजुएला और ग्रीनलैंड तक पहुंच गया, लेकिन अंततः कोर्ट में बहस का केंद्र भारत की संवैधानिक प्रक्रिया और ‘ड्यू प्रोसेस’ ही बना रहा।










