
Karnataka Political Crisis : कर्नाटक में मुख्यमंत्री पद को लेकर सत्ता संघर्ष का लंबा इतिहास रहा है। हाल ही में मुख्यमंत्री सिद्दरमैया और उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार की मुलाकात ने 2004-2008 के दौर की यादें ताजा कर दी हैं, जब कांग्रेस और जेडी(एस) ने मिलकर सरकार बनाई थी। उस समय भी दोनों पार्टियों ने गठबंधन किया था, लेकिन बाद में जेडी(एस) ने भाजपा के साथ हाथ मिलाते हुए 20-20 महीने के लिए सीएम पद साझा करने का वादा किया। हालांकि, जेडी(एस) ने अपने वादे का पालन नहीं किया, जिससे सरकार गिर गई।
कर्नाटक में सत्ता की लड़ाई पहले भी हिंसक टकराव का रूप ले चुकी है। पिछले हफ्ते ही मुख्यमंत्री सिद्दरमैया और उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार ने नाश्ते पर मिलकर मुलाकात की, जिसमें इडली, सांभर और उमपा का स्वाद लेते हुए कांग्रेस में चल रही तकरार को ठंडा करने का प्रयास किया गया। लेकिन यह लड़ाई न केवल पार्टी के भीतर बल्कि पूरे राज्य की राजनीति को प्रभावित कर रही है, और इसकी शुरुआत 2004 के गठबंधन से होती है।
यह कहानी 2004 में शुरू हुई, जब कर्नाटक में विधानसभा चुनाव हुए। उस वक्त तीन मुख्य पार्टियां थीं- कांग्रेस, जेडी(एस), और बीजेपी। चुनाव में किसी भी पार्टी को बहुमत नहीं मिला, लिहाजा जेडी(एस) ने किंगमेकर की भूमिका निभाई और कांग्रेस के साथ मिलकर सरकार बना ली। लेकिन यह गठबंधन ज्यादा दिन नहीं चल पाया, और 2006 में कहानी में नया मोड़ आया।
2006 में जेडी(एस) के कुमारास्वामी ने बीजेपी से हाथ मिला लिया। दोनों पार्टियों के बीच समझौता हुआ कि 20-20 महीने तक मुख्यमंत्री पद दोनों को मिलेंगे। पहले कुमारास्वामी मुख्यमंत्री बने। लेकिन जैसे ही दोनों पार्टियों के बीच विश्वास टूटने लगा, सरकार में भ्रष्टाचार और विकास कार्यों को लेकर मतभेद उठने लगे।
20 महीनों के बाद, जब बीजेपी ने मुख्यमंत्री पद देने का वादा किया, तो जेडी(एस) ने अपने वादे से मुकरते हुए कुमारास्वामी को पद पर बने रहने दिया। इससे बीजेपी ने नाराजगी जाहिर की और गठबंधन तोड़ दिया। अक्टूबर 2007 में कुमारास्वामी ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। इसके बाद राज्य में राजनीतिक अस्थिरता बढ़ी और सरकार गिर गई।
मई 2008 में फिर से विधानसभा चुनाव कराए गए, जिसमें बीजेपी ने 110 सीटें हासिल कर शानदार जीत दर्ज की। इसके साथ ही, कई महीनों तक चली राजनीतिक उथल-पुथल का अंत हो गया और बीजेपी ने सरकार बना ली। इस पूरे घटनाक्रम ने कर्नाटक की राजनीति में सत्ता के लिए लड़ाई और गठबंधन-टूटने का एक लंबा इतिहास कायम कर दिया है।















