
- शहर में फिलहाल 18 हजार श्रमिक कॉलोनियों में बसे हैं किरायेदार
- 72 बरस पुरानी कॉलोनियों में कई साल के किराया भी जमा नहीं
- सभी कॉलोनियों में बीते 30 साल से मरम्मत का काम भी बंद है
कानपुर। कोशिश कामयाब हुईं तो जल्द ही शहर के 18 हजार परिवारों की धनतेरस के दिन चांदी होगी। शहर की श्रमिक कॉलोनियों में बतौर किरायेदार आबाद परिवारों को मालिकाना हक देने की दिशा में प्रदेश सरकार ने कदम आगे बढ़ाए हैं। दीपावली का उपहार शहर के साथ-साथ प्रदेश के 36 हजार परिवारों को मिलने की उम्मीद है। विधानसभा अध्यक्ष की अगुवाई में गठित कमेटी की सिफारिशों के आधार पर श्रमिक कॉलोनियों के किरायेदारों को मकान मालिक बनाने के रास्ते खोजना शुरू कर दिया गया है। मकान मालिक बनने के लिए किरायेदारों को न्यूनतम कीमत अदा करनी पड़ेगी। इसके अलावा किरायेदारों को वैध कब्जे वाले हिस्से का मालिक बनाया जाएगा।
श्रम विभाग का दखल सिर्फ कागजों
दरअसल, ब्रिटिश हुकूमत के समय शहर में डेढ़ दर्जन से ज्यादा कपड़ा मिलों के साथ-साथ एचएएल में उत्पादन होता था। ऐसे में शहर में बड़े पैमाने पर मजदूर जैसे-तैसे जिंदगी गुजारते थे। आजादी के बाद मजदूरों की आवास समस्या के निदान के लिए वर्ष 1950 में श्रमिक कालोनियों का निर्माण का श्रीगणेश किया गया। करीब तीन साल बाद वर्ष 1953 से मजदूरों को कॉलोनियां आवंटित होने लगीं। उस वक्त एक कमरे की कॉलोनी का किराया 10.50 रुपये था, जबकि दो कमरे वाली कॉलोनी के लिए प्रति महीना 18.50 रुपये अदा करने होते थे। वर्ष 1970 में किराया बढ़ाकर क्रमशः 17.50 रुपये और 23 रुपये किया गया, जोकि वर्ष 1990 में 125 रुपये तथा 235 पहुंच गया।
मिलें बंद हुईं तो बिकने लगीं कॉलोनियां
वर्ष 1990 के दौर में कानपुर में वामपंथी आंदोलन के कारण तेजी के साथ कपड़ा मिलों में तालाबंदी हुई तो बेरोजगार हुए मजदूर अपने पैतृक जिलों में पलायन करने लगे। इसी के साथ शुरू हुआ श्रमिक कॉलोनियों के अवैध खरीद-फरोख्त का सिलसिला। इसी दरमियान वर्ष 1997 में हाईकोर्ट ने दिल्ली व ओडिशा की तर्ज पर यूपी की श्रमिक कालोनियों का स्वामित्व देने का निर्णय सुनाया। यह दीगर बात है कि, 28 वर्ष का वक्त गुजरने के बावजूद, कोर्ट के आदेश पर अमल नहीं हुआ। बहरहाल, मजदूरों ने पलायन किया और हाईकोर्ट के आदेश से मालिक बनने की उम्मीद थी, लिहाजा नोटरी लिखा-पढ़ी के जरिए कॉलोनियों की अवैध खरीद-फरोख्त शुरू हो गई। फिलवक्त अधिकांश कॉलोनियों में सिकमी किरायेदार ( आवंटी किरायेदार के स्थान पर दूसरा अवैध किरायेदार) काबिज हैं।
महाना की अगुवाई में निकलेगा रास्ता
बीते पखवारे विधानसभा अध्यक्ष सतीश महाना ने अपने कैंप कार्यालय में एक महिला की व्यथा सुनकर मालिकाना हक दिलाने के लिए नए सिरे से प्रयास करने का फैसला किया। विधानसभा अध्यक्ष ने कॉलोनियों के मालिकाना हक का मामला मुख्यमंत्री तक पहुंचाया तो अब योगी सरकार की उत्तर प्रदेश राज्य परामर्शदात्री समिति ने सकारात्मक रुख अपनाया। इसी के बाद विधानसभा अध्यक्ष ने श्रममंत्री अनिल राजभर, विधायक सुरेंद्र मैथानी, श्रमायुक्त मार्कंडेय शाही संग लखनऊ में विधानसभा प्रेक्षागृह में बैठक कर 15 जून तक सर्वे रिपोर्ट मांगी है। श्रमायुक्त ने बताया कि सर्वे रिपोर्ट तैयार कराकर समिति के सामने रखी जाएगी। फिलहाल, विधानसभा अध्यक्ष सतीश महाना की अध्यक्षता में गठित कमेटी को कॉलोनियों के मालिकाना हक की समस्या का हल निकालने का जिम्मा सौंपा गया है।
16 जून को कैबिनेट करेगी प्रस्ताव पर विचार
विधानसभा अध्यक्ष सतीश महाना ने दावा किया, 16 जून को कॉलोनियों के मालिकाना हक के मसले पर विस्तृत प्रस्ताव बनाकर कैबिनेट में रखा जाएगा। कॉलोनियों के मालिकाना हक के लिए कितनी कीमत अदा करनी होगी, कितना एरिया बतौर मालिकाना हक हासिल होगा, जैसे तमाम विषय श्रमायुक्त के सर्वे और उच्चस्तरीय कमेटी के मंथन के आधार पर तय होंगे। श्री महाना ने स्पष्ट किया कि, कॉलोनियों में मौजूदा समय में रहने वालों को ही मालिक बनाया जाएगा। फिलहाल, श्रम विभाग को बकाया किराया की वसूली की नोटिस से परहेज करने के लिए कहा गया है। इस संदर्भ में उत्तर प्रदेश श्रमिक बस्ती महासंघ के अध्यक्ष डॉ. शैलेंद्र दीक्षित ने कहाकि, श्रमिक कॉलोनियों की मूल लागत यानी 10-12 हजार रुपए की कीमत में मालिकाना हक देना चाहिये।