
कैसरगंज : कस्बे से सटे हुए गांव बाजारपुर और नौगैया के रहने वाले स्वतंत्रता संग्राम सेनानी स्वर्गीय पुत्तू सिंह ने जब अंग्रेजों के खिलाफ बिगुल फूंका तो अंग्रेजों ने उनके खेत में लगी फसल को जलवा दिया। पुत्तू सिंह के घरवालों पर बहुत अत्याचार किया गया, लेकिन देशभक्ति का जज्बा उनके दिल और दिमाग में दिन-ब-दिन बढ़ता गया।
पुत्तू सिंह का जन्म बाजार पुरवा नवगईंया, कैसरगंज, जिला बहराइच में हुआ। उन्होंने कैसरगंज जूनियर स्कूल में कक्षा 8 तक पढ़ाई की।
8 अगस्त 1942 को महात्मा गांधी जी ने नारा दिया था कि 9 अगस्त को अंग्रेज भारत छोड़ दें। इस नारे से प्रभावित होकर पुत्तू सिंह 8 अगस्त को दोपहर में कैसरगंज स्थित गंडारा बाजार में भाषण देने जा रहे थे। वे लोगों की मीटिंग में शिरकत करने जा रहे थे। उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ एक टीम गठित कर, भारत छोड़ो आंदोलन” के तहत मीटिंग की योजना बनाई थी और उस कार्यक्रम में सम्मिलित होने जा रहे थे।
इसकी जानकारी अंग्रेजों को लग गई और उन्हें भाषण देने से पहले गिरफ्तार कर 6 महीने के लिए जेल भेज दिया गया। 6 महीने पूरे होने के बाद जब उनकी रिहाई का आदेश हुआ, तो अंग्रेजों ने उन्हें नजरबंद करने का आदेश पारित कर एक साल के लिए और जेल में रखने की सजा सुना दी। इस तरह वे लगभग डेढ़ साल से अधिक समय तक जेल में रहे।
1947 में जब देश आज़ाद हुआ, उसके बाद पुत्तू सिंह को कलेक्टर द्वारा ताम्रपत्र देकर सम्मानित किया गया। लेकिन आज तक न तो स्व. पुत्तू सिंह को किसी अन्य सम्मान से नवाजा गया, और न ही उनके नाम पर कोई सड़क, अस्पताल, गेट, द्वार या स्कूल बनाया गया।
उनके तीन पुत्र थे, जिनमें से दो पुत्र जीवित हैं।
क्रांति सिंह, उम्र 85 वर्ष, लोकतंत्र सेनानी हैं।
देश आजाद होने के बाद कांग्रेस सरकार ने सेनानियों को ₹300 मासिक पेंशन देना शुरू किया था। पुत्तू सिंह को अधिकतम ₹800 पेंशन मिली और वे 20 वर्षों तक जिला पंचायत सदस्य रहे।
दिसंबर 1984 में उनका देहांत हो गया।
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