
Supreme Court : सुप्रीम कोर्ट ने जस्टिस यशवंत वर्मा द्वारा दायर उस महत्वपूर्ण याचिका को खारिज कर दिया है, जिसमें उन्होंने उनके खिलाफ लाए गए महाभियोग प्रस्ताव के तहत न्यायमूर्ति (जांच) अधिनियम, 1968 के अनुसार जांच समिति के गठन के लिए लोकसभा अध्यक्ष के निर्णय को चुनौती दी थी। यह मामला देश की न्यायपालिका और राजनीतिक व्यवस्था के बीच जारी जटिल संघर्ष का एक प्रमुख चरण है।
मामला शुरू हुआ जब जस्टिस वर्मा के आधिकारिक आवास से 14 मार्च को जले हुए नोटों के बंडल मिलने के बाद उनके खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाया गया। सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों ही पक्षों ने उनके खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव पेश करने की मांग की। इस विवाद के केंद्र में था कि उनके खिलाफ यह कदम क्यों उठाया गया, और इस प्रक्रिया में न्यायपालिका की स्वतंत्रता और पारदर्शिता पर सवाल उठने लगे।
इसके बाद, जस्टिस वर्मा ने इस महाभियोग प्रस्ताव के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का रूख किया। उन्होंने दावा किया कि उनके खिलाफ लाए गए इस प्रस्ताव में उचित प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया है और न्यायमूर्ति (जांच) अधिनियम, 1968 के तहत जांच समिति का गठन करने का अधिकार केवल लोकसभा अध्यक्ष को है, जिसका निर्णय उन्हें चुनौती दी जा रही है।
शीर्ष अदालत ने इस याचिका पर सुनवाई के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया था। आज, शुक्रवार को, न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति सतीश चंद्र की पीठ ने इस याचिका को खारिज कर दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि लोकसभा अध्यक्ष के निर्णय में हस्तक्षेप नहीं किया जाएगा और इस प्रक्रिया को अंतिम मानते हुए आगे की जांच का रास्ता साफ कर दिया है।
सुनवाई के दौरान, वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी, जिन्होंने जस्टिस वर्मा का पक्ष रखा, और भारत के सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता, जिन्होंने लोकसभा सचिवालय का पक्ष रखा, दोनों ने अपनी-अपनी दलीलें प्रस्तुत कीं। अदालत ने दोनों पक्षों की बातों को ध्यान से सुनने के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया।
इससे पहले, 8 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि यदि उपराष्ट्रपति राष्ट्रपति की अनुपस्थिति में राष्ट्रपति के कार्यों का निर्वहन कर सकते हैं, तो राज्यसभा के उपसभापति, सभापति की अनुपस्थिति में उनके कार्यों का क्यों नहीं कर सकते? इस टिप्पणी का उद्देश्य भी इस विवाद में नया आयाम जोड़ना था।
जस्टिस वर्मा के तर्क थे कि राज्यसभा के उपसभापति के पास प्रस्ताव को अस्वीकार करने का अधिकार नहीं है और केवल अध्यक्ष और सभापति ही इस अधिकार के अधिकारी हैं। लेकिन पीठ ने इस तर्क को खारिज कर दिया।
यह पूरा मामला न्यायपालिका की स्वतंत्रता, संसदीय प्रक्रियाओं और महाभियोग की संवैधानिक प्रक्रिया के बीच टकराव का प्रतीक बन चुका है। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद, महाभियोग प्रक्रिया के तहत जस्टिस वर्मा के खिलाफ आगे की जांच का मार्ग प्रशस्त हो गया है, जो आने वाले दिनों में राजनीतिक और न्यायिक जगत के लिए अहम साबित हो सकता है।
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