Jhansi : कर अधीक्षक की डायरियां खोलेंगी रिश्वत के राज

  • नगर निगम के सामने बनी बिल्डिंग से कर अधीक्षक का भाई कारोबार चलाता था सिडिंकेट
  • जमीन कारोबारी, खनन घाट, होटलों व प्रतिष्ठानों में निवेश के पुख्ता सबूत सीबीआई के हाथ लगे
  • बचाने के लिए कारोबारियों ने लखनऊ व दिल्ली में डाला डेरा

Jhansi : केंद्रीय वस्तु एवं सेवाकर (सीजीएसटी) के झांसी कार्यालय में कर अधीक्षक के पद पर तैनात अनिल तिवारी की गिरफ्तारी के बाद सीबीआई को महत्वपूर्ण दस्तावेज मिले हैं। इनमें डायरियां भी शामिल है। पता चला है कि नगर निगम के सामने बनी बिल्डिंग से कर अधीक्षक का भाई सिंडिकेट बनाकर कारोबार चलाता था। यही नहीं, जमीन कारोबारी, खनन घाट, होटलों व प्रतिष्ठानों में निवेश किए जाने के सबूत सीबीआई के हाथ लगे हैं। इसके अलावा पांच साल के रिकार्डों की भी तलाश की जा रही है। इस कार्रवाई से बड़े कारोबारियों व जन प्रतिनिधियों की नींद हराम हो गई है। वह अपने आप को बचाने के लिए दिल्ली व लखनऊ में डेरा जमाए हुए है।

एसीबी की टीम खंगालेंगी फाइलें

सीबीआई ने डिप्टी कमिश्नर प्रभा भंडारी, कर अधीक्षक अनिल तिवारी, अजय शर्मा, कारोबारी राजू मंगतानी, तेजपाल मंगतानी, लोकेश तोलानी एवं अधिवक्ता नरेश गुप्ता के खिलाफ मामला दर्ज कर जांच लखनऊ शाखा के सीबीआई एंटी करप्शन ब्रांच के निरीक्षक आशीष कुमार सिंह को सौंप दी। जांच के लिए पुरानी फाइलें भी खंगाली जा रही है। कार्यालय से पांच साल पुरानी फाइलें मांगी गई है। सूत्रों का कहना है कि कारोबारी 18 दिसंबर को जय अंबे प्लाईवुड एवं जय दुर्गा हार्डवेयर में तलाशी के दौरान अनिल तिवारी ने कारोबारियों से रिश्वत की मांग की थी। तिवारी ने अधिवक्ता को बताया था कि कारोबारियों के यहां भारी मात्रा में अघोषित माल व आपराधिक प्रकृति के साक्ष्य प्राप्त हुए है।

हर माह होती थी तीन-चार करोड़ की उगाही

झांसी, उरई, ललितपुर, हमीरपुर के सभी बड़े कारोबारियों से अनिल तिवारी व उसका का भाई सीधी डीलिंग करता था। हर माह तीन-चार करोड़ की उगाही थी। इसका हिसाब वह अपनी डायरियों में रखता था। अनिल ने अपनी व भाई के नाम से करोड़ों रुपये का निवेश झांसी, लखनऊ एवं दिल्ली की कई संपत्तियों में कर रखा है। वहीं, सीबीआई ने डिप्टी कमिश्नर के घर से भी डायरी व लैपटॉप बरामद किए हैं। इन डायरियों से कई राज खुलने की संभावना है।

अदालत से अनुमति लेकर खोले जाएंगे बैंक के लॉकर

बताते हैं कि कारोबारियों के ठिकानें से बरामद दस्तावेजों को जांच के लिए कार्यालय में जमा किया जाना था, ताकि कुल टैक्स चोरी का निर्धारण किया जा सके। लेकिन ऐसा नहीं किया गया। इससे सीबीआई को भी पता नहीं चल सका कि छापे में कितने करोड़ रुपये की टैक्स चोरी सामने आई थी। सीबीआई जल्द ही अदालत से अनुमति लेकर आरोपियों के बैंक लॉकर खुलवाने का प्रयास करेगी।

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