
लखनऊ, सोनभद्र : उत्तर प्रदेश में अवैध खनन को लेकर नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक CAG की रिपोर्ट ने खलबली मचा दी है। रिपोर्ट में बसपा विधायक उमाशंकर सिंह पर अवैध खनन और सरकारी अधिकारियों की मिलीभगत से जुर्माना राशि में हेराफेरी का गंभीर आरोप लगाया गया है। यह घोटाला न केवल खनन नियमों की धज्जियां उड़ाता है, बल्कि सरकारी खजाने को करीब 6 करोड़ रुपये की क्षति पहुंचाने का मामला भी उजागर करता है।
कंपनी के नाम पर किया गया अवैध खननCAG रिपोर्ट के अनुसार, सोनभद्र जिले में छात्र शक्ति इंफ्रा-कंस्ट्रक्शन नामक कंपनी द्वारा अवैध खनन किया गया। यह कंपनी बसपा विधायक उमाशंकर सिंह की पत्नी के नाम पर रजिस्टर्ड है। कंपनी को सरकार द्वारा 3,000 रुपये प्रति घनमीटर की दर से पत्थर खनन का पट्टा आवंटित किया गया था, जबकि उसकी रॉयल्टी दर 160 रुपये प्रति घनमीटर निर्धारित थी।
कंपनी ने अनुबंध से अधिक 33,604 घनमीटर पत्थर का खनन किया। जब यह अवैध खनन उजागर हुआ, तो अधिकारियों ने रॉयल्टी दर के आधार पर पांच गुना जुर्माना लगाकर मामले को निपटा दिया। जबकि नियमानुसार, जुर्माना नीलामी दर के आधार पर तय किया जाना चाहिए था।
जुर्माने की दर में गड़बड़ी से हुआ करोड़ों का नुकसानCAG ने रिपोर्ट में कहा है कि यदि जुर्माना नीलामी दर (₹3,000 प्रति घनमीटर) पर लगाया जाता, तो कंपनी को सरकार को 10.08 करोड़ रुपये जमा करने होते। लेकिन अधिकारियों ने केवल 3.22 करोड़ रुपये वसूल कर मामले को रफा-दफा कर दिया। इस प्रकार, सरकारी खजाने को सीधे तौर पर 6.86 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ।
अधिकारियों की मिलीभगत और चेतावनी को किया नजरअंदाजरिपोर्ट में उल्लेख है कि खनन विभाग की तत्कालीन निदेशक रौशन जैकब ने 14 जुलाई 2023 को ही इस अनियमितता को लेकर सोनभद्र के जिलाधिकारी को पत्र लिखकर आगाह किया था। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा था कि जुर्माना नीलामी दर के अनुसार वसूला जाए। लेकिन इस पत्र की अनदेखी करते हुए जुर्माना रॉयल्टी दर पर ही वसूला गया।
चौंकाने वाली बात यह है कि इस पत्र के कुछ ही समय बाद रौशन जैकब का ट्रांसफर कर दिया गया, जिससे इस कार्रवाई पर सवाल उठने लगे हैं।
क्या कहती है रिपोर्ट और क्या उठते हैं सवाल CAG की रिपोर्ट में स्पष्ट कहा गया है कि पट्टा धारकों को लाभ पहुंचाने के लिए जुर्माने की वसूली में नया फॉर्मूला अपनाया गया, जो नियमों के विरुद्ध है। इसके पीछे अधिकारियों और राजनीतिक रसूखदारों की मिलीभगत को जिम्मेदार ठहराया गया है।
इस मामले ने न केवल खनन विभाग की कार्यशैली पर सवाल खड़े कर दिए हैं, बल्कि यह भी संकेत दिया है कि राजनीतिक संरक्षण में नियमों को ताक पर रखकर कैसे सरकारी राजस्व को चूना लगाया जा रहा है।
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