
History of Turkman Gate: देश के महानगरों से लेकर छोटे कस्बों तक सरकारी जमीन पर अतिक्रमण कोई नई बात नहीं है। अक्सर प्रशासन तब तक चुप रहता है जब तक अदालत हस्तक्षेप न करे। ऐसा ही एक मामला दिल्ली में सामने आया है, जिसने इतिहास के पन्नों को एक बार फिर चर्चा में ला दिया है।
मामला है तुर्कमान गेट के पास स्थित फैज-ए-इलाही मस्जिद और उसके आसपास हुए कथित अवैध अतिक्रमण का। जब यह मामला दिल्ली हाईकोर्ट पहुंचा, और अदालत ने अतिक्रमण हटाने का आदेश दिया, तो कार्रवाई के दौरान इलाके में बवाल मच गया। पत्थरबाजी, आंसू गैस के गोले और भारी पुलिस बल की तैनाती ने तुर्कमान गेट को एक बार फिर सुर्खियों में ला दिया।

तुर्कमान गेट का ऐतिहासिक महत्व
तुर्कमान गेट, मुगल बादशाह शाहजहां के शासनकाल में बसाए गए शाहजहानाबाद (पुरानी दिल्ली) के प्रमुख दरवाजों में से एक है। 17वीं शताब्दी में बने इस गेट का निर्माण उस समय हुआ जब दिल्ली को एक मजबूत किलेबंद राजधानी के रूप में विकसित किया जा रहा था।

नाम का रहस्य
तुर्कमान गेट का नाम प्रसिद्ध सूफी संत शाह तुर्कमान के नाम पर पड़ा, जिनकी दरगाह गेट के पास स्थित है। यहां हर साल उनके उर्स का आयोजन होता है। गेट की बनावट आयताकार है, जिसमें तीन मेहराबी प्रवेश द्वार और दो मंजिला बुर्ज शामिल है। यह मुगल वास्तुकला का एक अहम उदाहरण माना जाता है।
औरंगजेब से संबंध?
कई बार सवाल उठता है कि औरंगजेब का तुर्कमान गेट से क्या संबंध है। हालांकि गेट का निर्माण शाहजहां के शासनकाल में हुआ और औरंगजेब शाहजहां का पुत्र था, लेकिन इसका कोई सीधा ऐतिहासिक संबंध नहीं पाया गया। सोशल मीडिया और अधूरी जानकारी के कारण यह भ्रम अक्सर फैलता रहा।

पहली बार बुलडोजर कब चला?
तुर्कमान गेट का नाम पहली बार बड़े स्तर पर 13 अप्रैल 1976 को चर्चा में आया, जब आपातकाल के दौरान संजय गांधी के निर्देश पर दिल्ली में झुग्गी हटाओ अभियान चलाया गया। तुर्कमान गेट इलाके में पहली बार बुलडोजर पहुंचा। शुरुआती विरोध सीमित था, लेकिन इसका असर जल्दी ही बढ़ गया।
संजय गांधी के फैसले का असर
संजय गांधी के फैसले ने पुरानी दिल्ली के कई हिस्सों में गुस्सा और असंतोष फैला दिया। जामा मस्जिद, चांदनी चौक और तुर्कमान गेट में आम हड़तालें हुईं। मजदूर संगठनों और वामपंथी दलों ने विरोध को संगठित किया, जो जल्द ही हिंसक रूप ले गया। 19 अप्रैल 1976 को तुर्कमान गेट संघर्ष का मैदान बन गया। बुलडोजर आगे बढ़े, लोग सड़कों पर उतर आए, दोजाना हाउस पर हमला हुआ और पुलिस ने लाठीचार्ज व आंसू गैस का इस्तेमाल किया। महिलाओं और बच्चों को भी नहीं बख्शा गया। यह घटना दिल्ली के इतिहास का एक दर्दनाक अध्याय बन गई।
2025 में फिर क्यों चर्चा में?

करीब पाँच दशक बाद, तुर्कमान गेट फिर सुर्खियों में है। इस बार कारण है फैज-ए-इलाही मस्जिद के आसपास सरकारी जमीन पर अवैध अतिक्रमण। अदालत ने अतिक्रमण हटाने का आदेश दिया। 6 जनवरी 2025 को बुलडोजर चला, जिसके बाद स्थानीय लोगों ने विरोध शुरू किया। स्थिति इतनी बिगड़ी कि पत्थरबाजी हुई और पुलिस को आंसू गैस का इस्तेमाल करना पड़ा। पूरे इलाके को सुरक्षा बलों ने छावनी में तब्दील कर दिया।
तुर्कमान गेट का यह मामला न केवल ऐतिहासिक महत्व की सुरक्षा की याद दिलाता है, बल्कि यह भी दिखाता है कि सरकारी जमीन पर अतिक्रमण और कानून के पालन के बीच संघर्ष आज भी जारी है।















