
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मिर्जापुर जिले के एक पति की याचिका को खारिज कर दिया, जिसने अपनी पत्नी का अंतरंग वीडियो बिना उसकी सहमति के सोशल मीडिया पर वायरल कर दिया था। न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर की अदालत ने मामले की गंभीरता को देखते हुए तल्ख टिप्पणी की, जिसमें पति को पत्नी का संरक्षक और न कि मालिक बताया गया।
इस मामले की शुरुआत तब हुई जब प्रदुम्न यादव ने अपनी पत्नी के खिलाफ दहेज उत्पीड़न के मामले में सुलह के बाद 13 सितंबर 2021 को उसे ससुराल आने दिया। पत्नी ने अदालत में आरोप लगाया कि पति ने उसकी अनुमति के बिना अंतरंग वीडियो बनाया और उसे रिश्तेदारों तथा सोशल मीडिया पर वायरल कर दिया। इसके चलते उसकी प्रतिष्ठा को गंभीर नुकसान पहुंचा है।
पुलिस ने इस मामले की जांच के बाद प्रदुम्न के खिलाफ आईटी एक्ट के तहत आरोप पत्र दाखिल किया। इसके बाद प्रदुम्न ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर जिला अदालत द्वारा जारी समन को चुनौती दी। याचिका में प्रदुम्न ने अपने अधिवक्ता के माध्यम से यह तर्क पेश किया कि पीड़िता legally उसकी विवाहित पत्नी है और अंतरंगता उसका अधिकार है। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि वीडियो बनाने और उसे सोशल मीडिया पर अपलोड करने का कोई ठोस सबूत उपलब्ध नहीं है।
हालांकि, हाईकोर्ट ने प्रदुम्न के तर्कों को खारिज करते हुए कहा कि पत्नी का शरीर उसकी अपनी संपत्ति है और उसके निजी जीवन से जुड़ी प्रत्येक बात में उसकी सहमति अनिवार्य है। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि विवाह एक पवित्र रिश्ता है, जिसका आधार विश्वास है, और किसी भी पति को यह अधिकार नहीं है कि वह स्वयं को पत्नी का मालिक समझे और इस प्रकार से विवाह के पवित्रता को भंग करे।
कोर्ट के इस निर्णय ने एक महत्वपूर्ण संदेश दिया कि पति-पत्नी के बीच संबंधों में सम्मान और भरोसे का कितना महत्व है और किसी भी रूप में इसका उल्लंघन सहन नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा कि ऐसे व्यक्ति को जो अपनी पत्नी के विश्वास को तोड़े, किसी प्रकार की राहत नहीं दी जा सकती है। इस निर्णय ने समाज में महिलाओं के अधिकारों और उनकी गरिमा की सुरक्षा के लिए एक सकारात्मक कदम उठाया है।