
Somnath Temple : गंगा और यमुना की धाराएं मिलती हैं, जहां सरस्वती का अदृश्य प्रवाह अभी भी चेतना को स्पर्श करता है और जहां स्वयं भगवान शिव, महादेव, विराजमान हैं, वह स्थान केवल एक तीर्थ नहीं, बल्कि भारतीय आत्मा का केंद्र है। लेकिन, इस पवित्र भूमि का इतिहास सिर्फ आस्था का प्रतीक ही नहीं, बल्कि संघर्ष और वीरता की भी कहानी है।
आपको याद दिला दें कि, 1026 में महमूद गजनवी ने सोमनाथ मंदिर को ध्वस्त कर दिया था। छह टन से अधिक सोना लूटकर ले गया और मंदिर को खंडहर में बदल दिया। उस समय के आक्रांताओं ने इस मंदिर के स्वर्णाभूषण, मूर्तियों और खजाने को लूट लिया था। फिर भी, इस मंदिर की आस्था और श्रद्धा आज भी अडिग है।
महमूद गजनवी की 1026 की उस लूट में, उसने सोमनाथ मंदिर से छह टन से अधिक सोना, रत्न, और खजाना लूट लिया। मंदिर की महिमा और उसकी दिव्यता को देखकर वह हैरान रह गया था।
महमूद के इस आक्रमण के बाद भी, हजारों वर्षों से चली आ रही उस धार्मिक परंपरा और श्रद्धा का दीपक बुझ नहीं पाया। यह मंदिर सिर्फ पत्थरों का ढांचा नहीं, बल्कि संघर्ष, स्वाभिमान और पुनः स्थापित होने की कहानी है।
आज, हम उस समय की याद दिलाते हुए, गुजरात में आयोजित ‘सोमनाथ स्वाभिमान पर्व’ और समारोह की खबर लेकर आए हैं। इस कार्यक्रम में हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भाग लिया और 108 अश्वों के साथ शौर्य यात्रा निकाली।
आइए जानते हैं कि इस शौर्य यात्रा में 108 घोड़ों का क्या महत्व है। यह परंपरा सदियों से चली आ रही है। 108 का नंबर हिंदू धर्म में बहुत पवित्र माना जाता है। यह संख्या शक्ति, वीरता, और धर्म के साथ जोड़कर देखी जाती है। सोमनाथ मंदिर की शौर्य यात्रा में 108 घोड़ों का निकलना, शक्ति और साहस का प्रतीक है। यह श्रद्धालुओं में वीरता, साहस और आत्मबल का संचार करता है। यह परंपरा न केवल धार्मिक बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक भी है, जो देश-विदेश से आए श्रद्धालुओं को एक साथ जोड़ती है।
सोमनाथ मंदिर के इतिहास में दर्द और साहस के कई किस्से भरे पड़े हैं। महमूद गजनवी के बाद, विभिन्न विदेशी आक्रमणकारियों ने कभी सोमनाथ मंदिर को नष्ट करने का प्रयास किया। चालुक्य वंश के राजा भीम प्रथम ने जब मंदिर का पुनर्निर्माण किया, तो उसकी स्मृतियों को भी इतिहास में जगह मिली।
1299 में दिल्ली सल्तनत के सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी ने भी इस मंदिर को ध्वस्त किया। इसके बाद, 1395 में जफर खान और 1469 में गुजरात के सुल्तान महमूद बेगड़ा ने मंदिर को क्षतिग्रस्त किया।
औरंगजेब के शासनकाल में, 1665-1706 के बीच, सोमनाथ मंदिर पर कई बार हमला हुआ। उसने इस मंदिर को जमींदोज करने का आदेश दिया, और उसकी पुनः मरम्मत के प्रयास भी हुए।
आधुनिक इतिहास में, देश की स्वतंत्रता के बाद, पहली बार, सरदार वल्लभभाई पटेल ने इस मंदिर का पुनर्निर्माण कराया। आजादी के बाद, भारत के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने 1951 में इस मंदिर का उद्घाटन किया। उस समय, कई नेताओं ने इस समारोह में भाग नहीं लिया, लेकिन राष्ट्रपति का आह्वान था कि यह मंदिर हमारी आस्था का प्रतीक है।
यह था सोमनाथ मंदिर का इतिहास, उसकी वीरता और उसकी अनसुनी कहानियों का एक संक्षिप्त अवलोकन। यह मंदिर न केवल पत्थरों का संग्रहालय है, बल्कि हमारे स्वाभिमान, हमारी आस्था और संघर्ष की जीवित कथा भी है।
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