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नई दिल्ली । वैज्ञानिकों का कहना है कि गंगाजल में बैक्टीरियोफेज और निंजा वायरस पाए जाते हैं, जो हानिकारक बैक्टीरिया को नष्ट करने का काम करते हैं। यही कारण है कि गंगाजल लंबे समय तक शुद्ध बना रहता है।
गंगाजल, जिसे भारत में अत्यधिक पवित्र माना जाता है, वर्षों तक खराब नहीं होता और इसमें कभी बदबू नहीं आती। इसके पीछे वैज्ञानिक कारण छिपे हैं, जो इसे अन्य नदियों के पानी से अलग बनाते हैं। भारत में गंगा नदी को केवल एक जल स्रोत नहीं, बल्कि ‘माता’ का दर्जा प्राप्त है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, गंगाजल को अमृत तुल्य माना जाता है और इसका सेवन करने से शरीर निरोगी रहता है। यह विभिन्न धार्मिक कार्यों जैसे हवन, पूजा-पाठ और संस्कारों में प्रयुक्त होता है। मान्यता है कि गंगाजल से स्नान करने से पापों का नाश होता है और मोक्ष की प्राप्ति होती है। गंगाजल की विशिष्टता को लेकर वैज्ञानिक वर्षों से शोध कर रहे हैं। 1890 में जब भारत में अकाल और हैजा जैसी महामारी फैली थी, तब कई शव गंगा नदी में प्रवाहित किए गए थे। ब्रिटिश वैज्ञानिक अर्नेस्ट हैन्किन ने इस पर शोध किया और पाया कि गंगाजल में बैक्टीरियल प्रदूषण बहुत कम था।
जबकि इस दौरान कई अन्य जल स्रोतों में बीमारी तेजी से फैल रही थी। अर्नेस्ट हैन्किन ने अपने अध्ययन में पाया कि गंगाजल में ऐसे तत्व मौजूद हैं, जो हैजा के बैक्टीरिया को नष्ट कर देते हैं।
इसके बाद फ्रेंच वैज्ञानिकों ने इस पर और शोध किया और पाया कि गंगाजल में निंजा वायरस मौजूद होते हैं, जो बैक्टीरिया को खत्म कर देते हैं। इसके अतिरिक्त, गंगाजल में ऑक्सीजन की मात्रा अधिक होती है, जो इसे सड़ने से बचाती है। गंगा का जल हिमालय से निकलकर विभिन्न जड़ी-बूटियों और खनिजों से होकर गुजरता है, जिससे इसमें प्राकृतिक रूप से शुद्धिकरण की क्षमता होती है। इसमें सल्फर की मात्रा अधिक होती है, जो इसे लंबे समय तक सुरक्षित बनाए रखता है।