
20 जनवरी, 2025 ये वो तारीख है जब ट्रम्प ने दूसरी बार अमेरिका के प्रेसिडेंट के तौर पर शपथ ली। अब यहाँ तक तो सब अच्छा और स्मूथ था। एलन मस्क से लेकर भारतीय प्रधानमंत्री मोदी ने ट्रम्प का न केवल समर्थन किया बल्कि इसे नए युग की शुरुआत तक बताया। हालाँकि ये दोस्ती, ये प्रेम ज्यादा दिन टिक नहीं पायी, उधर मस्क और ट्रम्प के बीच दरार आयी तो इधर भारत-पाक सीजफायर को लेकर अमेरिका और इंडिया के रिश्तों में भी खटास पैदा हो गयी। नोबेल की चाह में ट्रम्प ने रूस और यूक्रेन के बीच शांति समझौता भी कराने की कोशिश की, पुतिन को गले लगाकर जेलेंस्की को फटकार भी लगायी। चीन से दोस्ती का झूठा दिखावा भी किया, इजराइल फिलिस्तीन के बीच शांति समझौता भी कराया, पर मारिया कोरिना मचाडो को नोबेल मिलते ही ट्रम्प की तानाशाही सबके सामने आने लगी। खुद को वैश्विक शांतिदूत साबित करने पर तुले ट्रम्प अचानक डिक्टेटर वाली भूमिका में नजर आने लगे। ईरान पर हमला हो, वेनेज़ुएला के प्रेसिडेंट की गिरफ़्तारी हो या फिर ग्रीनलैंड पर मालिकाना हक़ की धमकी, इन सब से कहीं न कहीं ट्रम्प के इरादे साफ़ दिखाई पड़ने लगे है। वैसे तो ट्रम्प का कहना है कि वो ये सब दुनिया में शांति और समन्वय बनाये रखने के लिए कर रहे है, पर ऐसा कौन सा समन्वय जहाँ दुनिया को धमकाया जाये और उनपर हमले किये जायें। अगर इसकी तह तक जाएँ तो डोनाल्ड ट्रम्प कोई शांतिदूत तो बिलकुल नजर नहीं आते बल्कि वो दुनिया के खनिज और ऊर्जा पर कब्ज़ा करना चाहते है। स्टोरी को अंत तक पढ़ेंगे तो आपको ये साफ पता चलेगा कि ट्रम्प कैसे लीडरशिप की आड़ में डिक्टेटर बनते जा रहे है।
2026 की शुरुआत में डोनाल्ड ट्रम्प ने अमेरिका की “नेशनल सिक्योरिटी” और “शांति” के नाम पर कई देशों में आक्रामक कदम उठाए हैं, जिनका असली मकसद दुर्लभ खनिज (रेयर अर्थ मिनरल्स) और ऊर्जा संसाधनों पर नियंत्रण है। चीन वैश्विक रेयर अर्थ उत्पादन में 70% खनन और 90% प्रोसेसिंग का नियंत्रण रखता है – ये तत्व इलेक्ट्रिक वाहन, बैटरी, मोबाइल फोन और रक्षा उपकरणों के लिए आवश्यक हैं। ट्रंप बार-बार कहते हैं: “अगर हम नहीं लेंगे, तो रूस या चीन ले लेंगे।”
ग्रीनलैंड को धमकी
ट्रंप ने 2019 में पहली बार ग्रीनलैंड खरीदने का प्रस्ताव दिया था, जिसे डेनमार्क ने ठुकरा दिया। 2026 में उन्होंने इसे फिर उठाया – पर इस बार धमकी के साथ। ट्रंप कहते हैं, “ग्रीनलैंड हमारे लिए जरूरी है, नहीं तो रूस या चीन कब्जा कर लेंगे।” कारण? ग्रीनलैंड में दुर्लभ खनिजों के विशाल भंडार हैं – यूरोपीय कमीशन के अनुसार 34 क्रिटिकल मिनरल्स में से 25 यहां पाए जाते हैं, जिनमें रेयर अर्थ, लिथियम और यूरेनियम शामिल हैं। जलवायु परिवर्तन से बर्फ पिघलने से ये भंडार अब खनन के लिए सुलभ हो रहे हैं। ट्रंप ने $100 बिलियन का ऑफर भी दिया, लेकिन ग्रीनलैंडवासियों और डेनमार्क ने इसका विरोध किया और कहा की ये बिक्री के लिए नहीं है। हालंकि ट्रंप का तर्क है कि रूस और चीन की आर्कटिक में मौजूदगी बढ़ती जा रही है और अगर हमें इसकी रक्षा करनी है तो लीज से काम नहीं चलेगा बल्कि हमें इसका मालिकाना हक़ लेना होगा।
ट्रम्प की धमकी के बाद डेनमार्क ने ये स्पष्ट किया कि किसी भी तरह की सैन्य कार्रवाई ट्रांस-अटलांटिक रक्षा गठबंधन के अंत की वजह बन सकती है। ग्रीनलैंड दुनिया का सबसे कम आबादी वाला इलाका है पर उत्तर अमेरिका और आर्कटिक के बीच होने की वजह से मिसाइल हमलों की स्थिति में अर्ली वॉर्निंग सिस्टम्स के लिए ग्रीनलैंड की स्थिति अहम मानी जाती है।
वेनेज़ुएला के तेल पर नजर
वेनेजुएला के भीतर US स्पेशल फोर्सेस ने “ऑपरेशन एब्सोल्यूट रिजॉल्व” के तहत काराकास में रेड की और राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को उनकी पत्नी के साथ कैप्चर कर लिया। ट्रंप ने इसे “ड्रग ट्रैफिकिंग और तानाशाही” के खिलाफ कार्रवाई बताया। हालाँकि ये सब इतना साफ़ और सुलझा हुआ नहीं है, वेनेज़ुएला पर अमेरिकी कब्ज़ा ट्रम्प की भलाई का नहीं बल्कि खुली तानाशाही और वेनेज़ुएला के आयल रिज़र्व पर कब्ज़ा करने का सबूत है। वेनेजुएला दुनिया के सबसे बड़े ऑयल रिजर्व (300 बिलियन बैरल) का मालिक है, और यहां रेयर अर्थ के भंडार भी हैं। अब US वेनेजुएला के ऑयल सेल्स को “अनिश्चितकाल” तक कंट्रोल कर रहा है। ट्रंप ने साफ़तौर पर कहा है कि “वेनेजुएला को चीन-रूस से मुक्त करके केवल अमेरिका के साथ पार्टनरशिप करनी होगी।”
अमेरिकी ऊर्जा मंत्री क्रिस्टोफर राइट ने एक इंटरव्यू में ये साफ़ कर दिया की वेनेजुएला के तेल की बिक्री अमेरिकी सरकार द्वारा नियंत्रित और बाजार में बेची जाएगी तथा आय वाशिंगटन द्वारा नियंत्रित खातों में ही जमा होगी। काराकास और वाशिंगटन के बीच एक समझौता हुआ, जिसमें 30-50 मिलियन बैरल वेनेजुएला का कच्चा तेल अमेरिका को निर्यात किया जाएगा। वेनेजुएला के पास भंडारण टैंकों और जहाजों में लाखों बैरल तेल फंसा हुआ है, जिसे अब अमेरिकी नियंत्रण में वैश्विक बाजार में बेचा जाएगा। अमेरिका पहले 30-50 मिलियन बैरल फंसे तेल को बेचेगा, और फिर भविष्य के उत्पादन को जारी रखेगा। मायने अस्थिरता समाप्त करने के नाम पर सीधे-सीधे वेनेज़ुएला के तेल पर डाका।
ईरान में तख्तापलट की कोशिश
ईरान में सुप्रीम लीडर के खिलाफ हो रहे प्रदर्शन नार्मल नहीं है बल्कि इसके पीछे अमेरिका की सोची समझी रणनीति है। ईरान के पास दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल भंडार है – करीब 208 अरब बैरल। ये दुनिया के कुल प्रमाणित तेल का 12% से ज्यादा है साथ ही नैचुरल गैस भी भरपूर मात्रा में उपलब्ध है। आसान भाषा में कहे तो ईरान की अर्थव्यवस्था इसी पर टिकी है। लेकिन अमेरिका की नजर सिर्फ ईरान के तेल पर नहीं, बल्कि होर्मुज स्ट्रेट भी पर है। ये एक संकीर्ण समुद्री रास्ता है, जो फारस की खाड़ी को खुले समुद्र से जोड़ता है।
दुनिया का हर पांचवां बैरल तेल (लगभग 20-25%) और LNG का 20% इसी रास्ते से गुजरता है। रोजाना 20 मिलियन बैरल से ज्यादा। अगर ईरान चाहे तो ये रास्ता बंद कर सकता है – कोई जहाज नहीं निकलेगा। सऊदी अरब, इराक, UAE, कुवैत सबका तेल यहीं से निकलता है। अगर ईरान पर कंट्रोल हो जाए तो होर्मुज स्ट्रेट पर अमेरिका की पकड़ मजबूत हो जाएगी। दुनिया के तेल व्यापार का बड़ा हिस्सा उसके इशारे पर चलेगा और अमेरिका तेल के दाम कंट्रोल कर सकेगा। साथ ही ईरान सऊदी और इजराइल का दुश्मन है और दोनों अमेरिका के दोस्त। ईरान को कमजोर करके अमेरिका मिडिल ईस्ट में अपना दबदबा बढ़ाने की कोशिश में जुटा है।
स्पष्ट भाषा में समझे तो अमेरिका रूस और चीन की दोस्ती से डरा हुआ है। चीन की बढ़ती शक्ति और वैश्विक बाजार में मौजूदगी से अमेरीका को ये डर है कि उसका प्रभुत्व दुनिया से कम हुआ तो क्या होगा। भारत को बार-बार टैरिफ का डर दिखाने के पीछे भी एक यही सबसे बड़ा कारण है। कच्चे तेल के आयातकों में भारत तीसरे नंबर पर आता है, अपनी जरुरत का करीब 87% तेल आज भी भारत आयात करता है जिसमें सबसे ज्यादा रूस से खरीदा जाता है। ऐसे में ट्रम्प लगातार भारत पर दबाव बनाने में जुटे है की इंडिया रूस की जगह अमेरका या समर्थित देशो से तेल आयात करे।
ये सब देखकर साफ़ लागता है कि ट्रम्प “अमेरिका फर्स्ट” के नाम पर दुनिया के कीमती संसाधनों पर कब्जा करना चाहते है। तेल से दाम कंट्रोल, खनिजों से टेक्नोलॉजी पर पकड़, रास्तों से व्यापार पर दबदबा। चीन और रूस से खतरा सच है, लेकिन तरीका ये कि दूसरे देशों की आजादी छीन लो?














