
Saudi Arab and Pakistan : सऊदी अरब और परमाणु शक्ति से लैस पाकिस्तान के बीच NATO जैसी एक सैन्य संधि पर हस्ताक्षर किए गए हैं। यह रणनीतिक परस्पर रक्षा समझौता इस संकेत का प्रतीक है कि सऊदी अरब अब अपने सुरक्षा गठबंधनों में विविधता लाने के लिए तैयार है। यह समझौता ऐसे समय में हुआ है जब पारंपरिक रूप से अमेरिका की सुरक्षा गारंटी पर निर्भर खाड़ी देश, जैसे कतर, इजरायल के मिसाइल हमलों के बाद से काफी चिंतित हैं।
इस समझौते पर सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने रियाद में हस्ताक्षर किए। शहबाज शरीफ इस समय रियाद के दौरे पर हैं।
इस समझौते से भारत की चिंता बढ़ सकती है, क्योंकि इसमें कहा गया है कि यदि सऊदी अरब या पाकिस्तान में से किसी एक पर हमला होता है, तो दोनों के खिलाफ हमला माना जाएगा। एक वरिष्ठ सऊदी अधिकारी ने फाइनेंशियल टाइम्स को बताया कि हमें उम्मीद है कि इससे हमारी प्रतिरोधक क्षमता मजबूत होगी। एक के खिलाफ हमला दूसरे के खिलाफ माना जाएगा। यह व्यापक रक्षा समझौता है, जो विशिष्ट खतरों के आधार पर आवश्यक समझे जाने वाले सभी रक्षात्मक और सैन्य उपायों का प्रयोग करेगा।
कतर पर हमले का डर, खाड़ी देशों की चिंता
अमेरिका के प्रमुख गैर-नाटो सहयोगियों में से एक कतर पर इजरायल के हमले के बाद, खाड़ी देशों का वाशिंगटन पर भरोसा डगमगा गया है, और उन्हें अपनी सुरक्षा को लेकर चिंता सताने लगी है। खाड़ी देशों ने इस आशंका जताई है कि इजरायल पूरे क्षेत्र में अपनी सेना के साथ अनियंत्रित रूप से सक्रिय हो रहा है। फाइनेंशियल टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, रियाद ने पाकिस्तान के साथ रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर के बाद वाशिंगटन को इस बारे में सूचित किया था।
भारत के लिए क्यों है चिंता?
यह समझौता पाकिस्तान और भारत के बीच मई में हुए सैन्य संघर्ष के चार महीने बाद हुआ है। इस संधि से भारत को भी चिंता होनी स्वाभाविक है। शर्तों के अनुसार, यदि भारत पाकिस्तान पर हमला करता है, तो सऊदी अरब युद्ध में शामिल हो जाएगा। हालांकि, सऊदी ने अभी तक किसी भी विशिष्ट देश या घटना का उल्लेख नहीं किया है। एक वरिष्ठ सऊदी अधिकारी ने रॉयटर्स को बताया कि यह समझौता वर्षों से चली आ रही बातचीत का परिणाम है। यह किसी विशेष देश या घटना की प्रतिक्रिया नहीं है, बल्कि दोनों देशों के बीच दीर्घकालिक और गहरे सहयोग का संस्थागत स्वरूप है।
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