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लखनऊ डेस्क: पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने सिविल जज परीक्षा में महज 0.90 अंक से पास होने से चूकने वाली महिला अभ्यर्थी की याचिका खारिज कर दी है। याचिकाकर्ता का दावा था कि उसके एक उत्तर का मूल्यांकन गलत तरीके से किया गया है, लेकिन कोर्ट ने इस पर कोई हस्तक्षेप नहीं किया। कोर्ट ने कहा कि यह
परीक्षक का विशेषाधिकार है और इसमें कोर्ट को हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं है।
हरियाणा सिविल सेवा की न्यायिक परीक्षा में इस महिला अभ्यर्थी, जैस्मीन, को 550 की कटऑफ के मुकाबले 549.10 अंक प्राप्त हुए थे। जैस्मीन ने याचिका में यह तर्क दिया कि उसके द्वारा दिए गए एक उत्तर का मूल्यांकन गलत किया गया है।
कोर्ट की खंडपीठ, जिसमें चीफ जस्टिस शील लागू और जस्टिस सुमित गोयल शामिल थे, ने कहा कि याचिकाकर्ता के पास अपने अधिकारों का इस्तेमाल करने का संवैधानिक हक है, लेकिन उसे यह अधिकार संयम और सावधानी के साथ प्रयोग करना चाहिए। कोर्ट ने यह भी कहा कि उसकी भूमिका केवल न्याय की मांग तक सीमित होनी चाहिए और वह किसी भी आवेदक की भावनात्मक अपील के आधार पर निर्णय नहीं दे सकता।
कोर्ट ने कहा कि उत्तर का मूल्यांकन परीक्षक के विवेकाधिकार के तहत किया गया है, और इस पर कोर्ट का दखल देना उचित नहीं है। यदि मूल्यांकन में कोई स्पष्ट गलती नहीं हुई है, तो कोर्ट इसमें हस्तक्षेप नहीं कर सकता। खंडपीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि अगर कोर्ट ने भी मूल्यांकन प्रक्रिया को गलत माना, तब भी नियमों के तहत उत्तर पुस्तिकाओं का पुनर्मूल्यांकन संभव नहीं है। केवल सीमित पुनरावलोकन की अनुमति है, और इस मामले में ऐसा कुछ नहीं पाया गया जिससे यह कहा जा सके कि मूल्यांकन में कोई त्रुटि हुई है।
अंततः, कोर्ट ने जैस्मीन की याचिका को खारिज कर दिया।