
बिहार बोर्ड हमेशा अपनी तेज़ी से नतीजे घोषित करने के लिए सुर्खियों में रहता है। इस साल भी, बिहार बोर्ड ने 10वीं और 12वीं क्लास के नतीजे सबसे पहले जारी किए, जो 25 मार्च और 29 मार्च को घोषित किए गए थे। यह बिहार बोर्ड का हर साल का रिवाज रहा है। लेकिन जब बात राज्य के विश्वविद्यालयों की होती है, तो मामला बिल्कुल उलट है। यहां कई विश्वविद्यालयों में सेशन में लगातार देरी हो रही है, जिससे छात्रों को काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। सवाल यह उठता है कि जब बिहार बोर्ड इतनी जल्दी नतीजे घोषित कर सकता है, तो राज्य के विश्वविद्यालय क्यों पीछे हैं?
जय प्रकाश विश्वविद्यालय, सारण (छपरा) में भी स्थिति कुछ ऐसी ही रही है। इस विश्वविद्यालय के कुलपति, प्रोफेसर डॉ. प्रमेंद्र कुमार बाजपेयी ने बताया कि 2018 से सेशन में देरी हो रही थी, लेकिन अब उन्होंने कड़ी मेहनत से इसे सुधार लिया है। ग्रेजुएशन के सभी सेशन के एग्जाम हो चुके हैं और केवल रिजल्ट बाकी हैं, जो जल्द जारी कर दिए जाएंगे। वहीं, पोस्ट ग्रेजुएशन के सेशन में 6 महीने की देरी है, लेकिन इस साल उसे सुधारने की कोशिश की जा रही है। कुलपति ने यह भी कहा कि 2025 से पोस्ट ग्रेजुएशन के सेशन समय पर होंगे।
जय प्रकाश विश्वविद्यालय में 2018 से लेकर 2023 तक के सभी मार्कशीट में सुधार किया गया है। सभी लंबित परीक्षाएं पूरी हो चुकी हैं और अब सिर्फ रिजल्ट जारी होने बाकी हैं। उन्होंने यह भी बताया कि अगले 1-1.5 महीने में सभी पेंडिंग रिजल्ट जारी कर दिए जाएंगे और 2025 से विश्वविद्यालय का सेशन पूरी तरह सही हो जाएगा। जुलाई 2025 में नए एडमिशन लिए जाएंगे, और उसके बाद से किसी भी छात्र का सेशन लेट नहीं होगा।
वहीं, बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय (BBAU) में भी स्थिति बेहतर हो रही है। डीन स्टूडेंट वेलफेयर आलोक प्रताप सिंह ने बताया कि विश्वविद्यालय में एडमिशन में करीब एक साल की देरी हो रही है, लेकिन इसे सुधारने के लिए कदम उठाए जा रहे हैं। पोस्ट ग्रेजुएशन (PG) में 2024-26 बैच का एडमिशन हुआ है, जबकि ग्रेजुएशन (UG) में 2024-28 बैच का एडमिशन हुआ है और उनका पहला सेमेस्टर एग्जाम भी हो चुका है। हालांकि, UG सेशन फिलहाल 6 महीने पीछे चल रहा है।
राज्य के अन्य विश्वविद्यालयों की भी स्थिति कुछ वैसी ही है। कई विश्वविद्यालयों में 2025 बैच के एडमिशन की प्रक्रिया शुरू नहीं हो पाई है, और पहले बैच की फाइनल परीक्षाएं भी लंबित हैं। इससे अगले बैच के छात्रों के एडमिशन में और देरी की संभावना जताई जा रही है।
यह सवाल सामने आता है कि बिहार बोर्ड की तेज़ी और विश्वविद्यालयों की देरी के बीच अंतर क्यों है, और क्या इससे छात्रों को भविष्य में कोई समस्या उत्पन्न हो सकती है?