
- भ्रष्टाचार के मामले में सहायक चकबंदी अधिकारी भी फंसे
- वारिसान दर्ज कराने के नाम पर चकबंदी लेखपाल ने मांगी थी रिश्वत
भास्कर ब्यूरो
बरेली। उत्तर प्रदेश में भ्रष्टाचार के खिलाफ चल रही मुहिम के तहत एंटी करप्शन विभाग ने एक और बड़ी कार्रवाई करते हुए चकबंदी लेखपाल महावीर सिंह को 25 हजार रुपये की रिश्वत लेते हुए रंगे हाथ गिरफ्तार कर लिया है।
हैरानी की बात यह है कि इस भ्रष्टाचार की साजिश में अकेले लेखपाल ही नहीं, बल्कि सहायक चकबंदी अधिकारी भूरे सिंह का भी नाम सामने आया है। दोनों के खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम समेत कई गंभीर धाराओं में मुकदमा दर्ज कर लिया गया है। यह घटना न सिर्फ सरकारी तंत्र में फैले भ्रष्टाचार की पोल खोलती है, बल्कि आम जनता के उस दर्द को भी उजागर करती है, जो अपनों की मृत्यु के बाद भी सरकारी कार्यालयों के चक्कर लगाकर और रिश्वत की मांग झेलकर झुकने को मजबूर होती है।
पूरा मामला फरीदपुर क्षेत्र का है, जहां रहने वाले टंडन बाबू ने एंटी करप्शन विभाग में लिखित शिकायत दी थी। उन्होंने बताया कि उनकी मां, स्वर्गीय श्रीमती कलावती की मृत्यु के बाद गांव गजनेरा, चक संख्या 128 की कृषि भूमि उनके और उनके भाइयों के नाम वारिसान में दर्ज कराने के लिए उन्होंने संबंधित विभाग में आवेदन किया था। परंतु कानूनन हक़ पाने के इस सामान्य और न्यायसंगत कार्य को करने के लिए चकबंदी लेखपाल महावीर सिंह और सहायक चकबंदी अधिकारी भूरे सिंह ने उनसे 25 हजार रुपये की रिश्वत की मांग की।शिकायत मिलते ही एंटी करप्शन संगठन ने गंभीरता दिखाते हुए मामले की जांच शुरू की और सीओ एंटी करप्शन के निर्देशन में एक ट्रैप टीम गठित की गई। टीम प्रभारी बब्बन खान के नेतृत्व में इस ऑपरेशन की कमान संभाली गई।
आज दोपहर 11:11 बजे, योजनाबद्ध तरीके से कार्रवाई करते हुए टीम ने सदर क्षेत्र स्थित सहायक चकबंदी अधिकारी तृतीय कार्यालय के गेट के पास रिश्वत लेते हुए चकबंदी लेखपाल महावीर सिंह को रंगे हाथ धर दबोचा। गिरफ्तारी उस वक्त हुई जब महावीर सिंह शिकायतकर्ता से रिश्वत की रकम ले रहे थे।
गिरफ्तारी के बाद पूछताछ में महावीर सिंह के बयान और बरामद राशि की पुष्टि से यह साफ हो गया कि यह रिश्वत मृतक महिला की कृषि भूमि के नामांतरण के एवज में ली जा रही थी। नामांतरण यानी वारिसान दर्ज करने जैसी प्रक्रिया, जो पूरी तरह निःशुल्क और कानून के तहत तय है, उसे भी इन अफसरों ने कमाई का ज़रिया बना लिया था।
शिकायतकर्ता ने स्पष्ट किया कि बिना रिश्वत दिये नामांतरण फाइल आगे नहीं बढ़ रही थी और लगातार दबाव बनाया जा रहा था कि ‘काम तो होगा, लेकिन मुंह मीठा कराना पड़ेगा’।
इस मामले ने एक बार फिर साबित कर दिया कि सिस्टम में बैठे कुछ लालची अफसरों की वजह से आम आदमी का विश्वास सरकारी व्यवस्था से उठता जा रहा है। चकबंदी विभाग वैसे ही जटिल प्रक्रिया के लिए बदनाम है, और जब अधिकारी खुद ही रिश्वत के खेल में लिप्त मिलें, तो आमजन के लिए न्याय पाना और भी कठिन हो जाता है।
इस ट्रैप ऑपरेशन की सफलता के बाद कोतवाली में चकबंदी लेखपाल महावीर सिंह और सहायक चकबंदी अधिकारी भूरे सिंह के खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया गया है। दोनों पर भ्रष्टाचार अधिनियम की धारा 7 और 13(1)(डी) सहित भारतीय दंड संहिता की अन्य धाराओं में केस दर्ज कर कानूनी कार्यवाही शुरू कर दी गई है।