
Bahraich : निमोनिया पाँच साल से कम उम्र के बच्चों में एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती है, जिसके मामले सर्दियों में बढ़ जाते हैं। कई परिवार इसे ठंड लगना मानकर घरेलू उपायों पर निर्भर रहते हैं। इसी गलतफहमी और इलाज में देरी के कारण बच्चे गंभीर अवस्था में अस्पताल पहुँचते हैं, जबकि निमोनिया में समय पर उपचार सबसे अहम होता है।
जिला अस्पताल के चिल्ड्रेन वार्ड में भर्ती तीन माह का एक शिशु इसका उदाहरण है। उसकी माँ शांति देवी (बदला हुआ नाम) बताती हैं कि शुरुआत में ठंड समझकर घर पर लहसुन-अजवाइन वाले तेल से गरम सिकाई की गई, लेकिन जब बुखार बढ़ा और साँस तेज़ होने लगी, तब बच्चे को अस्पताल लाया गया। बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. एस.के. त्रिपाठी बताते हैं कि सर्दियों में ऐसे कई शिशु रोज़ प्राथमिक और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों से रेफर होकर आते हैं, जिनमें अधिकांश गंभीर निमोनिया से पीड़ित होते हैं।
शांति देवी का बच्चा फिलहाल इलाजरत है, लेकिन उसकी कहानी अकेली नहीं है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार पाँच साल से कम उम्र के बच्चों में होने वाली कुल मौतों में लगभग 14 प्रतिशत मौतें निमोनिया के कारण होती हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक इन मौतों का बड़ा कारण बीमारी की समय पर पहचान न होना और इलाज में देरी है।
ठंड नहीं, संक्रमण है असली वजह
डॉ. त्रिपाठी बताते हैं कि निमोनिया ठंड से नहीं, बल्कि वायरल और बैक्टीरियल संक्रमण से होता है। सर्दियों में बच्चों की रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर पड़ जाती है और इस मौसम में संक्रमण का प्रसार भी तेज़ी से होता है। ऐसे में शिशु को बार-बार छूने से बचाना, हाथों की स्वच्छता रखना और भीड़ से दूर रखना ज़रूरी है। घरेलू उपाय अक्सर इलाज में देरी करते हैं, वहीं आग या धुएँ के संपर्क से साँस की परेशानी और बढ़ सकती है। इसलिए निमोनिया के लक्षण दिखते ही समय गंवाए बिना बच्चे को तुरंत नज़दीकी स्वास्थ्य केंद्र या अस्पताल ले जाना चाहिए।
समुदाय स्तर पर रोकथाम
डीसीपीएम मो. राशिद बताते हैं कि आशा कार्यकर्ताओं को शिशुओं को ठंड से सुरक्षित रखने के लिए सही तरीके से कपड़े में लपेटने का प्रशिक्षण दिया गया है, ताकि सिर और पैर ढके रहें, लेकिन साँस लेने में कोई रुकावट न हो। इसके साथ ही उन्हें कंगारू मदर केयर, स्वच्छता के महत्व और निमोनिया से जुड़े खतरे के लक्षणों की पहचान सिखाई गई है। ये सभी उपाय संक्रमण के जोखिम को कम कर निमोनिया की रोकथाम में मदद करते हैं।
टीकाकरण और पोषण है मजबूत ढाल-
मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ. संजय कुमार के अनुसार संपूर्ण टीकाकरण, जन्म के तुरंत बाद माँ का पहला गाढ़ा दूध और छह माह तक केवल स्तनपान शिशु को संक्रमण से बचाने में अहम भूमिका निभाते हैं। कमजोर या कम वज़न वाले बच्चों में जोखिम अधिक होता है, इसलिए समय पर पहचान और इलाज तक जल्दी पहुँचना बेहद ज़रूरी है। इसके लिए निःशुल्क एम्बुलेंस सेवा 24 घंटे उपलब्ध है।
निमोनिया के खतरे के संकेत
- तेज साँस लेना
- पसलियों का अंदर धँसना
- स्तनपान या कुछ भी न पी पाना
- अत्यधिक सुस्ती या बेहोशी
- बुखार












