
- युवा बनाम दिग्गज: बालेन शाह ने पुरानी राजनीति को दी सीधी चुनौती
- नेपाली जनता की मांग,भ्रष्टाचार, बेरोज़गारी और महंगाई बने चुनावी मुद्दे
- 5 मार्च को तय होगा नेपाल का भविष्य
Sonauli, Maharajganj : नेपाल में एक बार फिर इतिहास के निर्णायक मोड़ पर खड़ा है। 5 मार्च को होने वाला आम चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन का अवसर नहीं, बल्कि पीढ़ियों के बीच टकराव और पुरानी राजनीति बनाम नई सोच की जंग बन चुका है। दशकों से सत्ता पर हावी वरिष्ठ नेताओं के सामने इस बार युवा नेतृत्व पूरी मजबूती से खड़ा है।सबसे बड़ा चेहरा बनकर उभरे हैं 35 वर्षीय बालेन शाह काठमांडू के पूर्व मेयर और कभी रैपर रहे स्वतंत्र नेता शाह ने भ्रष्टाचार विरोधी कदमों, अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई और प्रशासनिक पारदर्शिता से युवाओं का भरोसा जीता।

अब वे दोगुनी उम्र के दिग्गज नेताओं को सीधी चुनौती दे रहे हैं। उनका साफ कहना है कि नेपाल को नए विचार और जवाबदेही चाहिए, न कि वही पुराने चेहरे। यही कारण है कि पहली बार वोट डालने वाले युवा मतदाता बड़ी संख्या में उनके साथ खड़े हैं।वहीं दूसरी ओर नेपाल की राजनीति के ओल्ड गार्ड भी पूरी ताकत से मैदान में हैं। उनका तर्क है कि देश को इस समय अनुभव, स्थिरता और राजनीतिक समझ की जरूरत है। वे मानते हैं कि युवा जोश सराहनीय है, लेकिन सत्ता सौंपना जोखिम भरा हो सकता है। यही द्वंद्व इस चुनाव को बेहद दिलचस्प बना रहा है।

एक ओर परंपरा और अनुभव, तो दूसरी ओर ऊर्जा और बदलाव। भ्रष्टाचार, बेरोज़गारी, महंगाई और राजनीतिक अस्थिरता। बार-बार सरकारें बदलने से जनता थक चुकी है और अब ऐसे नेतृत्व की तलाश है जो केवल वादे नहीं, बल्कि ज़मीनी नतीजे दे सके। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह चुनाव तय करेगा कि नेपाल पुरानी राजनीति के सहारे आगे बढ़ेगा या नई पीढ़ी को नेतृत्व सौंपेगा।

भारत नेपाल संबंधों पर भी इस चुनाव का असर पड़ना तय है। अगर नए और युवा चेहरे सत्ता में आते हैं, तो संबंधों में टकराव से ज्यादा व्यावहारिकता देखने को मिल सकती है। नई पीढ़ी भावनात्मक राष्ट्रवाद से अधिक आर्थिक लाभ को प्राथमिकता दे सकती है। सीमा, व्यापार और आवागमन जैसे मुद्दों पर संवाद की भाषा मजबूत हो सकती है। शिक्षा, पर्यटन और रोजगार में सहयोग के नए अवसर खुल सकते हैं।हालांकि सीमा विवाद जैसे पुराने मुद्दे पूरी तरह खत्म नहीं होंगे, लेकिन नए नेतृत्व के साथ खुले संवाद और कूटनीतिक समाधान की संभावना बढ़ेगी। नेपाल का यह चुनाव केवल सत्ता की कुर्सी तय नहीं करेगा, बल्कि यह भी तय करेगा कि देश किस सोच के साथ आगे बढ़ेगा और भारत–नेपाल संबंध किस दिशा में जाएंगे।










