
पुस्तक समीक्षा:
[मुख्य साहित्य समीक्षक द्वारा]:भारतीय वांग्मय में ऋग्वेद केवल मंत्रों का संग्रह नहीं, बल्कि उस सभ्यता के उदय की गाथा है जिसने वैश्विक चेतना को ‘ऋत’ और ‘धर्म’ जैसे शब्द दिए। हाल ही में प्रकाशित वैदिक गाथा की तीन महत्वपूर्ण कृतियाँ— ‘ इंद्र’, ‘ब्रह्मर्षि युद्ध’ और ‘दशराज्ञ युद्ध —हमें उसी शैशव काल में ले जाती हैं जहाँ मर्यादाएं गढ़ी जा रही थीं और भारतवर्ष की नींव लहू से सिंचित हो रही थी। ये तीनों पुस्तकें एक साथ मिलकर उस कालखंड का संपूर्ण चित्र खींचती हैं जिसे इतिहास की पुस्तकों ने अक्सर हाशिए पर रखा है।
इंद्र: सिंहासन का मोह नहीं, व्यवस्था का संकल्प
श्रृंखला की पहली कड़ी ‘ऋत का रक्षक: इंद्र’ उस महानायक के मानवीकरण की कहानी है जिसे हम केवल वर्षा और स्वर्ग के देवता के रूप में जानते हैं। पुस्तक की भूमिका ही स्पष्ट कर देती है कि यह इंद्र के वैभव की नहीं, बल्कि उनके संघर्ष और त्याग की गाथा है। कश्यप की संतानों के बीच छिड़ा यह गृहयुद्ध दरअसल अराजकता और ‘ऋत’ (ब्रह्मांडीय व्यवस्था) के बीच का चुनाव था। लेखक ने इंद्र को एक ऐसे योद्धा के रूप में चित्रित किया है जो अपनों के ही विरुद्ध शस्त्र उठाने को विवश है। सौतेली माँ का श्राप और कुल की रक्षा का दायित्व इंद्र के चरित्र को जटिल और प्रभावशाली बनाता है। यह पुस्तक हमें बताती है कि ‘वज्रधारी’ बनने से पहले इंद्र को अपने सुखों की कितनी बड़ी आहुति देनी पड़ी थी।
विचारों की टकराहट: जब शस्त्रों पर शास्त्र भारी पड़े
जहाँ पहली पुस्तक सत्ता और व्यवस्था की बात करती है, वहीं *’ब्रह्मर्षि युद्ध’* सभ्यता के वैचारिक ध्रुवीकरण को उजागर करती है। यह पुस्तक उस भयावह सत्य से परिचय कराती है कि युद्ध केवल मैदानों में नहीं, बल्कि ऋषियों के मस्तिष्क में शुरू होते हैं। ब्रह्मा के मानस पुत्रों के बीच का यह संघर्ष अहंकार और सिद्धांतों की वह बिसात है, जहाँ राजा मात्र प्यादे थे। भूमिका के शब्द—”शस्त्र केवल हाथ काटते हैं, किंतु ऋषि का विचार सभ्यता बदल देता है”—पूरी पुस्तक का सार कह देते हैं। यह कृति दिखाती है कि कैसे परंपरा और नवाचार की लड़ाई ने आर्यावर्त के मानचित्र को रक्त से भिगो दिया था।
दशराज्ञ युद्ध: महाविनाश से महासृजन की ओर
तीसरी पुस्तक *’दशराज्ञ युद्ध (रक्त रंजित नियति)’* इस महागाथा का चरम बिंदु है। परुष्णी नदी के तट पर लड़ा गया यह युद्ध भारत के ज्ञात इतिहास का सबसे बड़ा जनसंहार था। लेखक ने महर्षि वशिष्ठ की कठोर मर्यादा और विश्वामित्र के क्रांतिकारी विद्रोह को आमने-सामने खड़ा किया है। इस युद्ध में परशुराम और सहस्त्रार्जुन जैसे महामानवों की उपस्थिति इसे केवल एक सैन्य संघर्ष नहीं, बल्कि एक दैवीय त्रासदी बना देती है। क्या शांति का मार्ग हमेशा विनाश से ही निकलता है? यह प्रश्न पाठक को पुस्तक बंद करने के बाद भी विचलित करता रहता है।
—पुस्तक का नाम,—मुख्य विषय,—-प्रमुख पात्र
: इंद्र,(ऋत का रक्षक)—व्यवस्था की स्थापना और प्रथम देवासुर संग्राम,—-“ब्रम्हा,इंद्र, अदिति, कश्यप”
ब्रह्मर्षि युद्ध—,वैचारिक संघर्ष और ऋषियों का कूटनीतिक प्रभाव—,”वेद, वशिष्ठ, विश्वामित्र, ब्रह्मर्षि”
दशराज्ञ युद्ध—आर्यावर्त का सबसे बड़ा ऐतिहासिक युद्ध,—-“परशुराम, सहस्त्रार्जुन, सुदास”
निष्कर्ष: क्यों पढ़ें ये पुस्तकें?
इन तीनों पुस्तकों का सामूहिक पठन एक अद्भुत अनुभव है क्योंकि:
ऐतिहासिक गहराई: ये ऋग्वैदिक काल के सामाजिक और राजनीतिक ढांचे को जीवंत करती हैं।
चरित्र चित्रण: इंद्र, वशिष्ठ और विश्वामित्र जैसे पात्रों को उनके मानवीय गुणों और दोषों के साथ पेश किया गया है।
समकालीन प्रासंगिकता: सिद्धांतों का टकराव और सत्ता का संघर्ष आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना हजारों वर्ष पूर्व था।
भागवत की लेखनी में ऋग्वैदिक काल के प्रति एक गहरा शोध और श्रद्धा दिखती है। उन्होंने पौराणिक पात्रों को देवताओं के आसन से उतारकर एक रक्त-मांस के मनुष्य के रूप में खड़ा किया है, जो अपनी नियति से लड़ रहे हैं। प्रलेक प्रकाशन ने इन विषयों को चुनकर हिंदी साहित्य में ऐतिहासिक उपन्यासों की कमी को पूरा किया है।
अंतिम शब्द: यदि आप भारतवर्ष के उदय, अपनी जड़ों और उस आदि-इतिहास को समझना चाहते हैं जो ऋचाओं के पीछे छिपा है, तो यह ‘त्रयी’ आपके लिए अनिवार्य है।
अंतिम शब्द: यदि आप भारतवर्ष के उदय, अपनी जड़ों और उस आदि-इतिहास को समझना चाहते हैं जो मंत्रों के पीछे छिपा है, तो यह ‘त्रयी’ (Trilogy) आपके लिए अनिवार्य है। ये पुस्तकें केवल पढ़ी नहीं, बल्कि महसूस की जाने वाली कृतियाँ हैं।
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*प्रकाशन विवरण:*
प्रकाशक ; प्रलेक प्रकाशन लेखक; भागवत जायसवाल
विधा: ऐतिहासिक/पौराणिक उपन्यास
उपलब्धता: सभी प्रमुख बुक स्टोर्स और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म ( अमेजॉन,फ्लिपकार्ट पर)
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📚 प्राचीन भारत की अनकही गाथाएँ! 🚩 हाल ही में लेखक भागवत जायसवाल की तीन शानदार पुस्तकें पढ़ने का अवसर मिला। ऋग्वैदिक काल के शौर्य, षड्यंत्र और सिद्धांतों की यह त्रयी (इंद्र, ब्रह्मर्षि युद्ध और दशराज्ञ युद्ध) आपको एक ऐसे युग में ले जाती है जहाँ भारतवर्ष की नींव रखी गई थी। प्रलेक प्रकाशन द्वारा प्रस्तुत ये कृतियाँ पौराणिक व इतिहास प्रेमियों के लिए किसी उपहार से कम नहीं हैं।














