
बिहार, पटना। शंभू गर्ल्स हॉस्टल में नीट की छात्रा की संदिग्ध मौत ने बिहार पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना का खुलासा होने के बाद से ही पूरे मामले में कई अनसुलझे पहलू उजागर हो चुके हैं, जो इस हाई-प्रोफाइल केस को यूपी से लेकर राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बना चुके हैं।
शाम ढलते ही हॉस्टल के बाहर लग्जरी गाड़ियों की लंबी कतारें और पुलिस के ‘सुसाइड’ वाले दावों के पीछे का खौफनाक सच अब पोस्टमार्टम रिपोर्ट ने बेनकाब कर दिया है। सवाल उठ रहे हैं कि क्या रसूखदार चेहरों को बचाने के चक्कर में पुलिस ने इस मामले को संदेह से परे कर दिया, या फिर जांच में बड़े ही छुपे हुए खेल रचे गए हैं। आईजी जितेंद्र राणा की एसआईटी जांच में अब बड़े खुलासे होने की उम्मीद है। 5 जनवरी की रात 9 बजे से 6 जनवरी दोपहर तक इन पांच चेहरों पर एसआईटी की नजर रहेगी।
पटना में नीट की तैयारी कर रही जहानाबाद की छात्रा की संदिग्ध परिस्थितियों में हुई मौत का मामला एक नए मोड़ पर पहुंच गया है। प्रारंभिक पुलिस रिपोर्ट और मेडिकल बोर्ड की विस्तृत पोस्टमार्टम रिपोर्ट के बीच बड़े ही चौंकाने वाले अंतर सामने आए हैं। इस छात्रा की मौत ने अब एक राजनीतिक और प्रशासनिक तूफान खड़ा कर दिया है, जिसमें कई रसूखदार चेहरे झुलस सकते हैं। यह मामला अब सिर्फ एक छात्रा की मौत का नहीं, बल्कि एक हाई-प्रोफाइल ‘कवर-अप’ की कहानी का प्रतीक बन गया है।
स्थानीय लोगों और सूत्रों के अनुसार, इस हॉस्टल के बाहर शाम होते-होते लग्जरी गाड़ियों की लंबी कतारें लग जाती थीं। सवाल उठ रहा है कि उन गाड़ियों में कौन आता था और उनका इस हॉस्टल के भीतर क्या काम था? क्या इन हाई-प्रोफाइल चेहरों को संरक्षण देने के लिए ही पुलिस और डॉक्टरों ने ‘सुसाइड’ की झूठी कहानी रची?
पुलिस की ‘थ्योरी’ और पोस्टमार्टम का ‘सच’
शुरुआती जांच में पटना के एएसपी सदर अभिनव कुमार और सीनियर एसएसपी कार्तिकेय शर्मा ने छात्रा की मौत को ‘नींद की गोलियों के सेवन’ और ‘सुसाइड हिस्ट्री’ से जोड़कर पेश किया था। लेकिन पोस्टमार्टम रिपोर्ट ने इस कहानी की पोल खोल दी है। रिपोर्ट में कहा गया है कि मृतका के गर्दन पर नाखूनों के निशान हैं, दाहिनी जुगुलर नस में पंक्चर है, और शरीर के विभिन्न अंगों जैसे छाती, जांघ और पीठ पर नीले निशान मिले हैं। सबसे चिंताजनक बात यह है कि उसकी जननांग क्षेत्र पर चोटें भी स्पष्ट हैं, जो बलात्कार या दरिंदगी की ओर इशारा कर रही हैं।
उन्होंने कहा कि 5 जनवरी की रात को छात्रा ने अपने माता-पिता से सामान्य बातचीत की थी, जिसमें उसने कहा था कि वह खाना खाने जा रही है। लेकिन 6 जनवरी को, हॉस्टल के अंदर उसे बेहोश पाया गया, और अब सवाल उठ रहे हैं कि उस दौरान क्या हुआ। हॉस्टल की वार्डन नीतू ठाकुर ने लड़की के माता-पिता को सूचित करने के बजाय उसकी एक सहेली के पिता, जो पूर्व सैनिक हैं, को फोन क्यों किया? माता-पिता से सच क्यों छुपाया गया? क्या इस बीच, साक्ष्यों को मिटाने की कोशिश की गई?
रसूखदारों की मिलीभगत और पुलिस की भूमिका
हॉस्टल के मालिक मनीष कुमार रंजन, संचालक श्रवण अग्रवाल और उनकी पत्नी नीलम अग्रवाल इस पूरे मामले में जांच के घेरे में हैं। मनीष रंजन की गिरफ्तारी हुई है, लेकिन उन्हें रिमांड पर लेकर पुलिस ने कड़ी पूछताछ क्यों नहीं की? परिजनों का आरोप है कि मनीष रंजन के प्राइवेट बॉडीगार्ड अस्पताल में उनके साथ मौजूद रहते थे और नीलम अग्रवाल केस को मैनेज करने की कोशिश कर रही थीं।
चित्रगुप्त नगर थाने की थाना प्रभारी रोशनी कुमारी पर भी उंगलियां उठ रही हैं। क्या उन्होंने रसूखदारों के दबाव में आकर जांच को कमजोर किया? क्या हॉस्टल की अन्य लड़कियों के बयान रिकॉर्ड किए गए हैं?
अस्पतालों का खेल और अंतिम आंसू
शाहजानंद क्लीनिक और प्रभात मेमोरियल अस्पताल में इलाज के नाम पर जो खेल खेला गया, वह संदिग्ध है। डॉक्टर सतीश की शुरुआती रिपोर्ट, जिसमें चोट के निशान न होने का दावा किया गया था, अब संदेह के घेरे में है। मृतका के मामा ने बताया कि जब लड़की को होश आया, तो वह अपनी मां से कुछ कहना चाह रही थी, लेकिन उससे पहले ही उसकी आंखों से आंसू निकल पड़े। तब उसकी आंखों में डर और दर्द साफ झलक रहा था। क्या उसे जबरन चुप कराने के लिए कोई इंजेक्शन दिया गया था?
आईजी जितेंद्र राणा की एसआईटी की चुनौतियां
अब इस पूरे मामले की जांच आईजी जितेंद्र राणा के नेतृत्व में गठित एसआईटी कर रही है। उनके सामने कई सवाल हैं…
- लड़की के वे कपड़े कहां हैं, जो उसने वारदात के वक्त पहने थे?
- मोबाइल फोन से डिलीट किया गया डेटा क्या राज खोल सकता है?
- हॉस्टल के रजिस्टर में अतिथियों के नाम क्यों गायब हैं?
- हॉस्टल का गार्ड उस रात कहां था?
- वीसरा रिपोर्ट आने से पहले पुलिस ने कैसे ‘सुसाइड’ का दावा कर लिया?
- सीसीटीवी फुटेज में गली वाले गेट पर क्यों कैमरा नहीं लगा था? क्या इसी गेट से आरोपी हॉस्टल में घुसे थे?
एम्स के विशेषज्ञों और फॉरेंसिक लैब की रिपोर्ट अब इस मामले में अंतिम निर्णायक साबित होगी। पटना पुलिस की साख दांव पर लगी है। यदि हाई-प्रोफाइल चेहरों के नाम सामने नहीं आए, तो यह बिहार के सिस्टम पर सबसे बड़ा धब्बा साबित होगा।
एक मां आज भी अपनी बेटी के इंसाफ की उम्मीद में दर-दर भटक रही है, जबकि सिस्टम के कुछ भाग आज भी दरिंदों को संरक्षण दे रहे हैं। यह मामला अब एक हाई-प्रोफाइल ‘कवर-अप’ की कहानी बन चुका है, जिसमें न्याय की उम्मीदें कहीं खो सी गई हैं।
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