
Lucknow : उत्तर प्रदेश में जाति के नाम पर होने वाली रैलियों को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ आज अहम फैसला सुना सकती है। इस मामले में राज्य सरकार अपना जवाब दाखिल कर चुकी है। जातीय रैलियों पर रोक से जुड़ी जनहित याचिका पर सोमवार को सुनवाई प्रस्तावित है।
न्यायमूर्ति राजन रॉय और न्यायमूर्ति अबधेश कुमार चौधरी की खंडपीठ के समक्ष स्थानीय अधिवक्ता मोतीलाल यादव द्वारा वर्ष 2013 में दाखिल जनहित याचिका 19 जनवरी को सूचीबद्ध की गई है। पिछली सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने कोर्ट को बताया था कि जातीय रैलियों पर रोक लगाने और आपराधिक मामलों में आरोपितों की जाति का उल्लेख न करने के आदेश जारी किए जा चुके हैं। इसके अनुपालन में पुलिस महानिदेशक की ओर से सर्कुलर भी जारी किया गया है।
इस मामले में केंद्र सरकार ने भी अपना पक्ष कोर्ट के समक्ष रख दिया है। केंद्र के जवाब पर कोर्ट ने याची को प्रतिउत्तर दाखिल करने के लिए समय प्रदान किया था। इससे पहले हाईकोर्ट ने प्रदेश में जातीय रैलियों पर अंतरिम रोक लगाते हुए केंद्र और राज्य सरकार के साथ-साथ केंद्रीय निर्वाचन आयोग एवं प्रमुख राजनीतिक दलों—कांग्रेस, भारतीय जनता पार्टी (भाजपा), समाजवादी पार्टी (सपा) और बहुजन समाज पार्टी (बसपा)—से जवाब तलब किया था।
हाईकोर्ट में सरकारी वकीलों की तैनाती पर भी सुनवाई आज
इलाहाबाद उच्च न्यायालय और लखनऊ पीठ में सरकारी वकीलों की तैनाती की प्रक्रिया को चुनौती देने वाले मामलों पर भी सोमवार को सुनवाई होगी। न्यायमूर्ति राजेश सिंह चौहान और न्यायमूर्ति राजीव भारती की खंडपीठ के समक्ष इस संबंध में दाखिल चार जनहित याचिकाएं 19 जनवरी को सूचीबद्ध हैं।
इन याचिकाओं में सरकारी वकीलों की नियुक्ति प्रक्रिया में पारदर्शिता सुनिश्चित करने की मांग की गई है। साथ ही वर्ष 1975 के एल.आर. मैनुअल में संशोधन किए जाने का आग्रह भी किया गया है। वर्ष 2017 में महेंद्र सिंह पवार द्वारा दाखिल जनहित याचिका समेत चार याचिकाओं में हाईकोर्ट में सरकारी वकीलों की नियुक्ति प्रक्रिया पर सवाल उठाए गए हैं। वर्तमान में इलाहाबाद हाईकोर्ट और उसकी लखनऊ पीठ में दो हजार से अधिक सरकारी वकील तैनात हैं।












