Sitapur : हरदोई चुंगी पर रेंगती जिंदगी और खाकी की बेशर्मी

  • कागजों में सिमटा ‘यातायात जागरूकता अभियान’
  • वसूली के नशे में चूर पुलिस, जाम के झाम में पिसती जनता

Sitapur : शहर में प्रशासन जिस ‘यातायात’ का ढिंढोरा मंचा से पीटकर अपनी पीठ थपथपा रहा है, उसकी सच्ची तस्वीर हरदोई चुंगी पर रोज देखने को मिलती है। सरकारी तंत्र की विफलता का आलम यह है कि एक ओर अधिकारी गुलाबी ठंड में जागरूकता रैलियों की फोटो खिंचवा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर शहर की लाइफलाइन कही जाने वाली यह चुंगी नरक का द्वार बन चुकी है। टीआई और उनकी टीम सड़कों से इस कदर नदारद है मानो उन्हें जनता की तकलीफों से कोई सरोकार ही न हो। ‘बगल में छोरा, शहर में ढिंढोरा’ वाली कहावत यहाँ बिल्कुल सटीक बैठती है, जहाँ समस्या पुलिस की नाक के नीचे है और समाधान के लंबे-चौड़े दावे बंद कमरों और मंचों पर हो रहे हैं।हरदोई चुंगी से लेकर एलआईसी तक भयानक जाम का सामना लोगों को करना पड़ता है।

हरदोई चुंगी पर तैनात होमगार्डों और ट्रैफिक सिपाहियों की कार्यशैली देखकर ऐसा लगता है जैसे उन्हें जनता की सेवा के लिए नहीं, बल्कि फोन पर गपशप लड़ाने और अपनी ड्यूटी के घंटों को जैसे-तैसे काटने के लिए नियुक्त किया गया है। गल्ला मंडी पुलिस चौकी के कारिंदों का हाल तो और भी बुरा है, उन्हें जाम में फंसे लोगों की चीखें सुनाई नहीं देतीं, क्योंकि उनके कान सिर्फ ‘वसूली’ की खनक सुनने के आदी हो चुके हैं।यहाँ जिम्मेदारी का निर्वहन नहीं, बल्कि निजी स्वार्थों की पूर्ति हो रही है। खाकी की यह संवेदनहीनता अब आम आदमी के सब्र का बांध तोड़ रही है।

सबसे वीभत्स मंजर तब देखने को मिलता है जब किसी जिंदगी को बचाने निकली एंबुलेंस इस बेतरतीब जाम के चंगुल में फंस जाती है। सायरन की आवाजें बेअसर हो जाती हैं और एंबुलेंस के भीतर तड़पता मरीज व्यवस्था की इस अपंगता पर आंसू बहाने के अलावा कुछ नहीं कर पाता। जब जान बचाने वाली गाड़ी ही जाम का शिकार हो जाए, तो प्रशासन के दावों को कूड़ेदान में डाल देना चाहिए। अगर जिला प्रशासन और यातायात पुलिस अब भी कुंभकर्णी नींद से नहीं जागे, तो यह यातायात माह चलाना महज एक सरकारी तमाशा बनकर रह जाएगा, जिसकी कीमत आम नागरिक को अपनी जान और कीमती समय देकर चुकानी पड़ रही है।

खबरें और भी हैं...

अपना शहर चुनें