
भारत में सड़क हादसों को अक्सर तेज रफ्तार, लापरवाही और ट्रैफिक नियमों के उल्लंघन से जोड़कर देखा जाता है, लेकिन एक नई रिपोर्ट ने इस सोच को झकझोर कर रख दिया है। रिपोर्ट बताती है कि देश में होने वाली ज्यादातर सड़क मौतें केवल ड्राइवर की गलती से नहीं, बल्कि खराब सड़क व्यवस्था, कमजोर इंजीनियरिंग और सिस्टम की नाकामी की वजह से हो रही हैं। सवाल यह है कि अगर लोग नियमों का पालन कर रहे हैं, तो फिर जानें क्यों जा रही हैं?
सड़क हादसों की असली वजह क्या है?
सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय (MoRTH) और सेव लाइफ फाउंडेशन की संयुक्त रिपोर्ट में सामने आया है कि सड़क दुर्घटनाओं में मरने वाले 59 फीसदी लोगों की मौत किसी भी बड़े ट्रैफिक नियम उल्लंघन के बिना हुई। इसका साफ मतलब है कि जानलेवा हादसों के पीछे खराब सड़क डिजाइन, घटिया निर्माण और कमजोर इंजीनियरिंग बड़ी वजह बन रही हैं।
शाम से रात तक सबसे ज्यादा खतरा
रिपोर्ट के मुताबिक, सड़क हादसों में 53 फीसदी मौतें शाम 6 बजे से रात 12 बजे के बीच होती हैं। इस दौरान कम रोशनी, ड्राइवर की थकान और तेज रफ्तार दुर्घटनाओं के जोखिम को कई गुना बढ़ा देती है। हैरानी की बात यह है कि इन हादसों में बड़ी संख्या उन लोगों की भी है, जो नियमों का पालन कर रहे थे।
देश के 100 सबसे खतरनाक जिले
अध्ययन देश के उन 100 जिलों पर केंद्रित है, जहां सड़क हादसों में सबसे ज्यादा मौतें दर्ज होती हैं। इस सूची में महाराष्ट्र का नासिक ग्रामीण जिला पहले स्थान पर है। इसके बाद पुणे ग्रामीण, पटना और अहमदनगर जैसे जिले आते हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, सिर्फ इन 100 जिलों में 2023 और 2024 के दौरान 89,085 लोगों की मौत हुई, जो देश में हुई कुल सड़क दुर्घटना मौतों का 25 फीसदी से अधिक है।
सड़क हादसों में भारत दुनिया में सबसे आगे
सड़क दुर्घटनाओं में होने वाली मौतों के मामले में भारत दुनिया में पहले नंबर पर है। आंकड़ों के मुताबिक, चीन में भारत के मुकाबले सिर्फ 36 फीसदी और अमेरिका में करीब 25 फीसदी सड़क मौतें होती हैं। बीते दो सालों में देशभर में लगभग 9.68 लाख सड़क हादसों में 35 लाख लोगों की जान जा चुकी है। यह आंकड़े बेहद गंभीर चेतावनी देते हैं।
किन राज्यों में हालात ज्यादा खराब?
रिपोर्ट बताती है कि सबसे ज्यादा खतरनाक जिलों की संख्या उत्तर प्रदेश में है, जहां 20 जिले इस सूची में शामिल हैं। इसके बाद तमिलनाडु (19), महाराष्ट्र (11), कर्नाटक (9) और राजस्थान (8) का नंबर आता है। यह साफ करता है कि सड़क सुरक्षा की समस्या किसी एक राज्य तक सीमित नहीं है।
सड़कें बहुत, सुरक्षा कम
भारत का सड़क नेटवर्क दुनिया में दूसरा सबसे बड़ा है, जिसकी लंबाई करीब 63.45 लाख किलोमीटर है। इसके बावजूद हैरानी की बात यह है कि कुल सड़क हादसा मौतों में से करीब 63 फीसदी मौतें राष्ट्रीय राजमार्गों के बाहर होती हैं। यानी रोजमर्रा में इस्तेमाल होने वाली संपर्क सड़कें ज्यादा खतरनाक साबित हो रही हैं।
हादसों के तय ठिकाने
रिपोर्ट के अनुसार, ज्यादातर दुर्घटनाएं कुछ खास जगहों पर बार-बार होती हैं। राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण और राज्य लोक निर्माण विभाग की सिर्फ 18 प्रमुख सड़कों पर 54 फीसदी मौतें दर्ज की गईं। इन मार्गों पर 379 ऐसे ब्लैक स्पॉट चिन्हित किए गए हैं, जिन्हें बेहद खतरनाक माना गया है।
टक्कर के तरीके और मौत की वजह
कुल मौतों में 72 फीसदी मामले पीछे से टक्कर, आमने-सामने की भिड़ंत और पैदल यात्रियों के कुचले जाने से जुड़े हैं। नियम उल्लंघन की बात करें तो
- तेज रफ्तार से 19 फीसदी
- लापरवाह ड्राइविंग से 7 फीसदी
- खतरनाक ओवरटेक से 3 फीसदी मौतें हुईं
यानी ज्यादातर मौतें नियम तोड़ने से ज्यादा सिस्टम की कमियों से जुड़ी हैं।
खराब इंजीनियरिंग बनी जानलेवा
रिपोर्ट में सड़क इंजीनियरिंग से जुड़ी 20 बड़ी खामियों की पहचान की गई है। इनमें कमजोर या टूटी क्रैश बैरियर, मिटे हुए रोड मार्किंग, बिना सुरक्षा के कंक्रीट ढांचे, गलत या टूटे साइन बोर्ड और स्ट्रीट लाइटिंग की कमी शामिल है। केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी भी कई बार खराब सिविल इंजीनियरिंग और कमजोर डीपीआर को सड़क हादसों की बड़ी वजह बता चुके हैं।
समाधान क्या है?
रिपोर्ट के मुताबिक, नई योजनाएं बनाने से ज्यादा जरूरी है कि मौजूदा सरकारी योजनाओं को सही तरीके से लागू किया जाए। सड़क एजेंसियों, पुलिस और अस्पतालों के बीच बेहतर तालमेल, खतरनाक सड़कों का नियमित सुरक्षा ऑडिट, पुलिस ढांचे को मजबूत करना और एंबुलेंस सेवाओं की गुणवत्ता सुधारना बेहद जरूरी है।















