मणिकर्णिका घाट विवाद : देवी अहिल्याबाई की प्रतिमा ध्वस्त, इतिहासिक धरोहर पर चोट ; इंदौर में बढ़ रहा गुस्सा

इंदौर : बनारस के ऐतिहासिक मणिकर्णिका घाट पर देवी अहिल्याबाई होलकर की प्रतिमा और घाट के एक हिस्से को ध्वस्त किए जाने का मामला गरमाता जा रहा है। इस घटना के विरोध में इतिहासकारों, समाज के विभिन्न वर्गों और आम नागरिकों ने नाराजगी जताई है। विवाद इसलिए भी गहरा गया क्योंकि देशभर में अहिल्याबाई होलकर की त्रि-जन्म शताब्दी समारोह मनाया जा रहा है।

मणिकर्णिका घाट के तारकेश्वर महादेव मंदिर के पास हुई इस कार्रवाई ने लोकआस्था को चोट पहुँचाई है। देवी अहिल्याबाई होलकर ने अपने शासनकाल में (1767-1795) कई धार्मिक और लोक-हित कार्य कराए थे। वे न्यायप्रिय, दानवीर और धार्मिक प्रवृत्ति की शासिका थीं। उनकी दूरदर्शिता के चलते ही गुजरात के सोमनाथ मंदिर के जीर्णोद्धार में उन्होंने 1783 में योगदान दिया था।

घाट का ऐतिहासिक महत्व
मणिकर्णिका घाट का निर्माण 1791 में देवी अहिल्याबाई ने करवाया था। यह घाट 84 प्रमुख घाटों में शामिल है और इसके पौराणिक महत्व के कारण विशेष पहचान रखता है। धर्मशास्त्र के अनुसार, शिव के कान की मणि इसी घाट के किसी कुंड में गुम हुई थी। घाट पर आज भी शवों का दाह संस्कार किया जाता है।

इतिहासकारों की प्रतिक्रिया
प्रसिद्ध इतिहासकार डॉ. कैलाश चंद्र पांडेय के अनुसार, अहिल्याबाई ने देशभर में लोक-उपयोगी कार्य किए और मणिकर्णिका घाट का निर्माण भी उनके धार्मिक समर्पण का प्रतीक था। उनका कहना है कि प्रतिमा को ध्वस्त किए जाने से पहले संरक्षित किया जाना चाहिए था। होल्कर इतिहासकार और पूर्व कुलपति डॉ. शिवनारायण यादव ने भी इसे इतिहास की धरोहर के प्रति गंभीर चोट बताया।

पुनर्विकास योजना
जुलाई 2023 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मणिकर्णिका घाट के पुनर्विकास का शिलान्यास किया था। रूपा फाउंडेशन, कोलकाता के फंड से घाट के 29,350 वर्ग मीटर क्षेत्र का विकास किया जा रहा है। इस योजना में शवों के धुएं के लिए चिमनी निर्माण और बाढ़ सुरक्षा जैसी सुविधाएँ शामिल हैं।

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