
ईरान इस समय गंभीर राजनीतिक उथल-पुथल के दौर से गुजर रहा है। सड़कों पर विरोध प्रदर्शन, सत्ता को लेकर अनिश्चितता और अंतरराष्ट्रीय राजनीति के दबाव के बीच यह सवाल उठने लगा है कि अगर ईरान में सत्ता परिवर्तन होता है तो उसका असर भारत पर कैसे पड़ेगा। यह स्थिति भारत के लिए जहां एक ओर चिंता का विषय है, वहीं कुछ संभावनाएं भी लेकर आती है। ऐसे में यह समझना जरूरी है कि भारत और ईरान के रिश्ते सिर्फ कूटनीतिक नहीं, बल्कि गहरे आर्थिक आधार पर भी टिके हुए हैं।
हाल के दिनों में ईरान में हिंसा और विरोध प्रदर्शनों की खबरें लगातार सामने आई हैं। इसी बीच अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बयान ने हालात को और संवेदनशील बना दिया है। उन्होंने संकेत दिया है कि ईरान के लोग बदलाव चाहते हैं और अमेरिका इस प्रक्रिया में उनका समर्थन करेगा। ऐसे बयानों के बाद यह आशंका बढ़ गई है कि अगर ईरान में सरकार बदलती है तो इसका असर केवल घरेलू राजनीति तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि वैश्विक व्यापार और उसके साझेदार देशों पर भी पड़ेगा।
भारत और ईरान के बीच संबंध लंबे समय से रणनीतिक और आर्थिक दोनों स्तरों पर मजबूत रहे हैं। भारत कच्चे तेल का दुनिया में तीसरा सबसे बड़ा उपभोक्ता है और अपनी जरूरत का करीब 85 प्रतिशत तेल आयात करता है। एक समय तक ईरान भारत के प्रमुख तेल आपूर्तिकर्ताओं में शामिल था, क्योंकि वहां का कच्चा तेल गुणवत्ता में अच्छा और कीमत के लिहाज से अपेक्षाकृत सस्ता माना जाता रहा है।
अगर भारत के ईरान से आयात की बात करें तो कच्चा तेल सबसे बड़ा हिस्सा रहा है। इसके अलावा भारत ईरान से पिस्ता और खजूर जैसे सूखे मेवे, कुछ विशेष केमिकल्स, पेट्रोकेमिकल उत्पाद और कांच से बने सामान भी मंगाता है। खास तौर पर सूखे मेवों की भारतीय बाजार में काफी मांग रहती है, जो त्योहारों और शादी के मौसम में और बढ़ जाती है।
वहीं भारत भी ईरान को कई जरूरी वस्तुओं का निर्यात करता है। इसमें सबसे अहम बासमती चावल है, जिसका ईरान लंबे समय से बड़ा खरीदार रहा है। इसके अलावा भारत से ईरान को चाय, चीनी, दवाइयां, ऑटोमोबाइल पार्ट्स और इंजीनियरिंग से जुड़े उत्पाद भी भेजे जाते हैं। इस व्यापार से भारत के कृषि, फार्मा और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को सीधा फायदा होता है।
ईरान की अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस पर निर्भर है। दुनिया के सबसे बड़े तेल और गैस भंडार वाले देशों में ईरान का नाम शामिल है। सरकारी राजस्व का बड़ा हिस्सा तेल निर्यात से आता है। इसके अलावा पेट्रोकेमिकल, उर्वरक और ऊर्जा से जुड़े उद्योग भी उसकी अर्थव्यवस्था की रीढ़ माने जाते हैं। हालांकि अमेरिका और पश्चिमी देशों द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों के कारण ईरान को कई बार अपने तेल और गैस निर्यात में भारी चुनौतियों का सामना करना पड़ा है।
अगर ईरान में सत्ता परिवर्तन होता है और नई सरकार की नीतियां मौजूदा व्यवस्था से अलग होती हैं, तो सबसे बड़ा असर तेल व्यापार पर पड़ सकता है। भारत जैसे देश, जो ऊर्जा आयात पर निर्भर हैं, उन्हें वैकल्पिक आपूर्तिकर्ताओं की ओर रुख करना पड़ सकता है। दूसरी ओर, ईरान के लिए भी यह स्थिति नुकसानदायक हो सकती है, क्योंकि भारत जैसे बड़े बाजार का खोना उसके तेल और गैर-तेल निर्यात दोनों को प्रभावित कर सकता है। इसके साथ ही सूखे मेवे और अन्य वस्तुओं का व्यापार भी अस्थिरता की चपेट में आ सकता है।















