
अयोध्या की पावन धरती पर नंदिनी निकेतन में आयोजित राष्ट्रकथा अपने दूसरे दिन, 3 जनवरी को, एक गहरे वैचारिक और सांस्कृतिक संवाद के रूप में आगे बढ़ती दिखाई दी। यह आयोजन केवल एक धार्मिक कथा तक सीमित नहीं, बल्कि संस्कार, चेतना और राष्ट्रबोध को जोड़ने वाला मंच बनता जा रहा है।
1 जनवरी को विधिवत शुभारंभ के साथ शुरू हुई इस राष्ट्रकथा ने पहले ही दिन यह स्पष्ट कर दिया था कि इसका उद्देश्य दिखावा नहीं, बल्कि विचार और आत्मचिंतन है। सादगी, अनुशासन और मर्यादा के वातावरण में आरंभ हुआ यह आयोजन धीरे-धीरे श्रोताओं के मन से जुड़ता चला गया।

2 जनवरी को कथा के पहले दिन रामकथा, कृष्णकथा और हनुमान चरित्र के माध्यम से जीवन मूल्यों, कर्तव्य और संस्कारों पर सार्थक संवाद स्थापित हुआ। कथा को सुनने के साथ-साथ श्रोताओं ने उसे अपने जीवन से जोड़ने का प्रयास किया। विद्यार्थी, युवा और वरिष्ठ नागरिक—सभी वर्गों में गहरी रुचि और जिज्ञासा देखने को मिली।
3 जनवरी, यानी राष्ट्रकथा का दूसरा दिन, इस जुड़ाव को और अधिक सशक्त करता हुआ नजर आया। आज कथा केवल मंच तक सीमित नहीं रही, बल्कि श्रोताओं की सोच, उनकी बातचीत और उनके दृष्टिकोण में उतरती हुई दिखाई दी। लोगों के चेहरों पर संतोष, शांति और स्पष्टता का भाव यह संकेत दे रहा था कि यह आयोजन विचारों को दिशा दे रहा है।
इस राष्ट्रकथा के केंद्र में बृजभूषण शरण सिंह जी की वह सोच स्पष्ट रूप से दिखाई देती है, जिसमें शिक्षा, संस्कार और युवाओं के चरित्र निर्माण को राष्ट्र निर्माण की आधारशिला माना गया है। उनके लिए यह आयोजन किसी एक दिन या एक मंच का कार्यक्रम नहीं, बल्कि एक दीर्घकालिक वैचारिक प्रयास का हिस्सा है।
पूरे आयोजन की आत्मा परम पूज्य सद्गुरु श्री रितेश्वर महाराज की वाणी में अनुभव की जा रही है। उनका कथन सरल, स्पष्ट और वर्तमान समय की वास्तविकताओं से जुड़ा हुआ है। वे कथा को केवल धार्मिक प्रसंगों तक सीमित न रखते हुए उसे सामाजिक जिम्मेदारी, अनुशासन और जीवन मूल्यों से जोड़ते हैं। आने वाले दिनों में उनकी वाणी से और अधिक गहन विषयों पर मार्गदर्शन मिलने की अपेक्षा की जा रही है।
राष्ट्रकथा के आगामी दिनों में यह वैचारिक प्रवाह और अधिक गहराने वाला है। 5 जनवरी को सद्गुरु श्री रितेश्वर महाराज के जन्मदिवस के अवसर पर विशेष आध्यात्मिक वातावरण बनने की संभावना है, वहीं 8 जनवरी को राष्ट्रकथा का समापन एक विशेष भावनात्मक अर्थ लेकर आएगा, क्योंकि यह दिन बृजभूषण शरण सिंह जी के जन्मदिवस से भी जुड़ा है।
नंदिनी निकेतन का शांत और अनुशासित वातावरण इस आयोजन को और प्रभावशाली बना रहा है। यहाँ उपस्थित लोग दर्शक नहीं, बल्कि सहभागी बनकर कथा से जुड़ रहे हैं। आयोजन से जुड़े युवा सहयोगियों की सक्रिय भूमिका भी इस बात का संकेत है कि राष्ट्रकथा पीढ़ियों को जोड़ने वाला मंच बनती जा रही है।
कुल मिलाकर, 3 जनवरी तक राष्ट्रकथा ने यह स्पष्ट कर दिया है कि यह केवल कथा नहीं, बल्कि एक विचार यात्रा है। आने वाले दिनों में यह आयोजन संस्कार, संस्कृति और राष्ट्रचेतना के संदेश को और व्यापक रूप से आगे बढ़ाने की दिशा में अग्रसर रहेगा।












