
Lucknow : इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने ई-रिक्शा चालकों को बड़ी राहत दी है। कोर्ट ने लखनऊ में ई-रिक्शा पंजीकरण के लिए “शहर का स्थायी निवासी होना जरूरी” वाली शर्त को पूरी तरह खारिज कर दिया। कोर्ट ने साफ कहा कि यह शर्त संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार), अनुच्छेद 19(1)(g) (व्यवसाय की स्वतंत्रता) और अनुच्छेद 21 (जीवन व व्यक्तिगत स्वतंत्रता) का खुला उल्लंघन है।
क्या था विवाद?
5 फरवरी 2025 को लखनऊ के सहायक संभागीय परिवहन अधिकारी (प्रशासन) ने एक आदेश जारी किया था, जिसमें दो सख्त शर्तें लगाई गई थीं:
जिसके पास पहले से एक ई-रिक्शा registered है, उसे दूसरा रिक्शा नहीं मिलेगा।
नया ई-रिक्शा पंजीकरण सिर्फ लखनऊ के स्थायी निवासियों को ही मिलेगा – यानी किराए के मकान में रहने वाले या बाहर से आए लोग बाहर!
इसी दूसरी शर्त को अजीत यादव समेत चार ई-रिक्शा चालकों ने हाई कोर्ट में चुनौती दी।
सरकार का तर्क और कोर्ट का करारा जवाब
सरकार की तरफ से कहा गया कि किराए पर रहने वाले लोग पता बदलते रहते हैं, इसलिए फिटनेस सर्टिफिकेट की नोटिस देना मुश्किल होता है।
कोर्ट ने यह दलील सिरे से खारिज कर दी।
न्यायमूर्ति शेखर बी. सराफ और न्यायमूर्ति बृजराज सिंह की बेंच ने कहा:
- किराए पर रहना कोई अपराध नहीं है। लखनऊ में लाखों लोग किराए के मकान में रहते हैं और गाड़ियां चलाते हैं।
- अगर ई-रिक्शा की संख्या नियंत्रित करनी है तो दूसरी वैज्ञानिक तरीके अपनाओ जैसे हर साल सिर्फ सीमित संख्या में नए पंजीकरण करो, या जिनका फिटनेस सर्टिफिकेट खत्म हो गया है उनकी गाड़ी जब्त कर लो।
- लेकिन सिर्फ इसलिए कि कोई किराए का मकान बदल लेता है, उसका रोजगार छीनना मनमानी और असंवैधानिक है।
चालकों में खुशी की लहर
याचिकाकर्ता अजीत यादव और अन्य चालक कोर्ट के बाहर मीडिया से बोले
हममें से ज्यादातर लोग गांव-कस्बों से रोजी-रोटी के लिए लखनऊ आए हैं। किराए का कमरा लेकर परिवार पाल रहे हैं। ये शर्त लगाते तो हमारा पूरा धंधा चौपट हो जाता। कोर्ट ने हमारी रोजी-रोटी बचाई।










