
नेपाली प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली डायलॉग पार्टनर के तौर पर एससीओ शिखर सम्मेलन में हिस्सा लेने के लिए चीन पहुंचे हैं। इस दौरान उन्होंने चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ द्विपक्षीय बैठक भी की है। इस बैठक में ओली ने जिनपिंग से लिपुलेख के रास्ते भारत-चीन सीमा व्यापार की घोषणा पर कड़ी आपत्ति भी जताई है।
ओली ने जिनपिंग के सामने दावा किया कि लिपुलेख नेपाल का हिस्सा है। इससे पहले नेपाली विदेश मंत्रालय ने काठमांडू में चीनी राजदूत के सामने भी इस मुद्दे पर आपत्ति जताई थी। हालांकि, भारत ने नेपाल की इन आपत्तियों को खारिज कर दिया था।
ओली ने जिनपिंग का किया गुणगान
चीन में नेपाली दूतावास ने एक बयान जारी कर कहा कि प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने जिनपिंग के साथ नेपाल-चीन संबंधों के विभिन्न पहलुओं पर चर्चा की और आने वाले दिनों में पारस्परिक रूप से लाभकारी सहयोग को आगे बढ़ाने की प्रतिबद्धता व्यक्त की। उन्होंने यह भी कहा कि ओली ने नेपाल के विकास प्रयासों में चीन के निरंतर समर्थन के लिए आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व के पांच सिद्धांतों पर आधारित नेपाल-चीन संबंध निरंतर मजबूत रहे हैं। प्रधानमंत्री ओटी ने शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) शिखर सम्मेलन 2025 की सफलता के लिए अपनी हार्दिक शुभकामनाएं दीं और चीन के राष्ट्रपति से एससीओ में नेपाल की सदस्यता की आकांक्षा का समर्थन करने का अनुरोध किया।
ओली ने लिपुलेख पर जताई आपत्ति
उन्होंने बीआरआई सहित पहले से सहमत परियोजनाओं के कार्यान्वयन में तेजी लाने की आशा व्यक्त करते हुए उर्वरक, पेट्रोलियम अन्वेषण, मानव संसाधन विकास, जलवायु लचीलापन और लोगों से लोगों के बीच संपर्क जैसे क्षेत्रों में समर्थन का अनुरोध किया। लिपुलेख दर्रे के माध्यम से सीमा व्यापार पर भारत और चीन के बीच हाल ही में बनी सहमति का उल्लेख करते हुए, ओली ने कहा कि यह क्षेत्र नेपाल का है और नेपाल सरकार ने इस पर अपनी कड़ी आपत्ति दर्ज कराई है।
भारत ने खारिज किया है नेपाल का दावा
भारत ने लिपुलेख पर नेपाल के दावे को खारिज कर दिया था। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि ऐसे दावे न तो उचित हैं और न ही ऐतिहासिक तथ्यों और साक्ष्यों पर आधारित हैं। उन्होंने कहा, “भारत और चीन के बीच लिपुलेख दर्रे से सीमा व्यापार 1954 में शुरू हुआ था और कई दशकों से जारी है। हाल के वर्षों में यह व्यापार कोविड और अन्य कारणों से बाधित हुआ था, लेकिन अब दोनों पक्षों ने इसे फिर से शुरू करने पर सहमति जताई है।” उन्होंने आगे कहा, “जहां तक क्षेत्रीय दावों की बात है, तो हमारी स्थिति साफ है कि ऐसे दावे न तो उचित हैं और न ही ऐतिहासिक तथ्यों और साक्ष्यों पर आधारित। किसी भी तरह के एकतरफा दावे स्वीकार नहीं किए जाएंगे।”
लिपुलेख पर नेपाल की दलील क्या है
नेपाली विदेश मंत्रालय ने कहा, “नेपाल सरकार स्पष्ट करना चाहती है कि महाकाली नदी के पूर्व में स्थित लिम्पियाधुरा, लिपुलेख और कालापानी नेपाल के अभिन्न हिस्से हैं। इन्हें नेपाल के नक्शे में आधिकारिक रूप से शामिल किया गया है और यह बात संविधान में भी दर्ज है।”
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