भास्कर एक्सप्लेनर : महाकुंभ स्नान से मन बाग-बाग…फिर आएंगे प्रयागराज

भास्कर टीमप्रयागराज से लौटकर…. हमारा भी मन कर रहा था प्रयागराज महाकुंभ में शाही स्नान.. माफ कीजियेगा…अमृत स्नान कर आएं। अपने पूर्वजों से सुन रखा था.. कुंभ में स्नान करना बहुत पवित्र होता है। टीवी, अखबारों में करोड़ों लोगों के अमृत स्नान देखकर तीर्थ पहुंचने की अपनी भूख भी बढ़ती जा रही थी। शुभ घड़ी के कई अवसर बीत गए थे और समय नहीं निकल पा रहा था। आखिरकार अंतिम महास्नान से पूर्व मौका मिल ही गया। फिर क्या.. कुछ साथियों के साथ गाड़ियों पर निकल पड़े प्रयागराज के लिए..।
यात्रा से पहले इस बात की चिंता थी भारी भीड़ में कोई लिंक या सिफारिश हो जाए, जिससे हम सीधे संगम नोज पर पहुंच जाएं…क्योंकि वहां नहाना ज्यादा शुभ और पवित्र माना जाता है, लेकिन पहुंचना उतना ही मुश्किल। वैसे हमने सुन रखा है गंगा तो सदा से पवित्र रही हैं … कहीं भी नहा लो लेकिन सबकी इच्छा गंगा यमुना और अदृश्य सरस्वती के संगम पर नहाने की थी।


लखनऊ से प्रयागराज की दूरी करीब दो सौ किमी है। घंटों थकाऊ यात्रा के बाद हम तीर्थ स्थल पहुंच गए थे। खास बात रही किसी की मदद नहीं लेनी पड़ी। मीडिया से जुड़े होने के कारण पुलिस का भी सहयोग मिल गया। पूरी रात यात्रा कर हम प्रयागराज पहुंचे थे। संगम तक जाते-जाते दिन के दो बज चुके थे। नाव के लिए भी लंबी लाइन थी। जैसे-तैसे हम नाव पर बैठने में सफल हो गए। नदी में उतरना हमारे लिए अकल्पनीय, अदभुत अनुभव था। संगम में डुबकी से सारी थकान मिट गई थी…हमारी यात्रा सफल हो गई थी। हम खुश थे..बाग-बाग थे। अमृत धारा से निकलने का मन नहीं था। बार-बार मन में यही कर रहा था कुछ दिन यहीं रह जाएं।

हमारे अनुभव…..


शिकंजी और डुबकी ।…मैं संगम में स्नान को लेकर में बहुत ही ज्यादा उत्साहित था..लेकिन वहां की धूप ने हालत टाइट कर दी थी। प्रयागराज कुंभ पहुंचते ही मैने वहां की शिकंजी पी ताकि थोड़ा आराम मिले ..और संगम में आस्था की डुबकी लगाई। रात में प्रयागराज की गलियों का लुफ्त उठाया, जो बहुत आनंद देने वाला था।

भक्ति का पॉजिटव इफेक्ट।….महाकुंभ में रस्ते भर जाम से परेशान रहे..जाम से निजात मिली तो प्रयागराज पहुंचे..सबसे ज्यादा आनंद संगम में स्नान करके आया। रात में कुंभ मेले में घूमने का भी आनंद लिया। सबसे पॉजीटिव मेरे लिए यह था कि वहां जितने भी लोग दिखे सब भक्ति में लीन थे। उन्हें देखकर सकारात्मक ऊर्जा मिली।

एंटिक पीस.. लाठी वाली मूर्ति…। कुम्भ में डुबकी लगाते ही थकान ख़त्म हुई। मेरे लिए यह सबसे अच्छा अनुभव था। यही नहीं तमाम यात्रियों के उत्साह को देखने को मिला जो अलग-अलग वेषभूषा और रंग रूप में नजर आए। बड़ा मजा आया जब लाठी लिए एक मूर्ति देखी। हकीकत में वो मूर्ति नहीं थी। एक साहब ने अपने को पेंटिंग से इस कदर तराशा था मानों कोई मूरत हों।

विलुप्त जीवों को बचाएं। ….कुंभ परिक्षेत्र में श्रद्धालुओं के बीच नमामि गंगे मंडपम आकर्षण का केंद्र था। बच्चे हों या युवा सभी नमामि गंगे के पंडाल को देखने में उत्साह दिखा रहे थे। हम भी देखने गए। मंडप में चित्रकारी के माध्यम से गंगा संरक्षण का बड़ा संदेश देखने को मिला। गैलरी के अंदर उन जीव-जंतुओं के स्टैच्यू भी रखे गए थे, जिनकी विलुप्ति निकट है। संदेश साफ था कि सनातन परंपरा से जुड़े लोगों को जीवों के संरक्षण की जिम्मेदारी लेनी चाहिए क्योंकि यह धरती सबके लिए है।

चौथा स्तंभ व पेट पूजा ।…. महाकुंभ में लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के लिए भी शानदार व्यवस्था थी। सूचना एवं जनसंपर्क विभाग द्वारा एक भव्य राष्ट्रीय मीडिया सेंटर बनाया गया था। यहां देश-दुनिया के पत्रकारों, छायाकारों के लिए अव्वल व्यवस्था थी । अत्याधुनिक कॉन्फ्रेंस रूम में विशिष्ट जन एवं अन्य लोगों से संवाद के लिए बेहतर प्रबंध था। यहां पत्रकारों, अतिथियों के खाने पीने की भी व्यवस्था बेहतर थी.. हम सबने खाया….पेट पूजा दिव्य थी

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