
नींबू और हरी मिर्च के दाम आसमान छू रहे हैं। नींबू 250 रुपए किलो में बिक रहा है, तो हरी मिर्च 200 रुपये किलो में मिल रही है। इतने दाम तो तब भी नहीं पहुंचे थे, जब कोरोना काल में लोगों को इम्यूनिटी बढ़ाने के लिए विटामिन सी के भरपूर स्रोत नींबू का इस्तेमाल करने की सलाह दी जा रही थी।
नींबू की महंगाई के लिए डीजल के भाव काफी हद तक जिम्मेदार
बताया जा रहा है कि इस बार फसल कम होने के साथ ही आंध्र प्रदेश और तेलंगाना से आने वाले नींबू की महंगाई के लिए डीजल के भाव भी काफी हद तक जिम्मेदार हैं। डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी से माल भाड़े में भी 15 फीसदी की बढ़ोतरी हो गई है। दुबग्गा मंडी के व्यापारी बताते हैं कि फिलहाल एक महीने तक नींबू की कीमतें ऐसी ही रहेंगी। स्थानीय नींबू की आवक शुरू होने पर ही दाम कम होंगे।
कोरोना काल को भी पीछे छोड़ दिया
इस बार नींबू की महंगाई ने कोरोना काल की महंगाई को भी पीछे छोड़ दिया है। बीते साल जब कोरोना पीक पर था तो विटामिन सी के लिए लोग नींबू पर ही टूट पड़े थे। अत्यधिक मांग होने के बावजूद कोरोना काल में भी नींबू के दाम 200 रुपए किलो से ऊपर नहीं गए थे। इस बार नवरात्रि और रमजान एक साथ पड़ने और डीजल के दामों में हो रही बढ़ोतरी ने आग में घी का काम किया है।
गर्मी के सीजन में नींबू की लोकल आवक खत्म हो जाती है। प्रदेश की मंडियों में आंध्र प्रदेश और तेलंगाना के तेनाली, इलूर और विजयवाड़ा से नींबू मंगाया जाता है। साउथ के प्रदेशों में भी इस बार नींबू की फसल अच्छी नहीं हो पाई है। उत्पादन में कमी और अधिक मांग होने से नींबू की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं।
हरी मिर्च की कालाबाजारी से बढ़े दाम
वहीं, हरी मिर्च की कहानी कुछ अलग ही है। इसके महंगा होने का कारण डीजल नहीं, खुदरा व्यापारियों द्वारा की जा रही अधिक मुनाफाखोरी है। इस समय हरी मिर्च की लोकल आवक बाराबंकी और प्रयागराज से हो रही है। थोक बाजार में हरी मिर्च 50 रुपए किलो में बिक रही है, लेकिन फुटकर मंडियों के दुकानदार इसे तीन से चार गुना अधिक दामों में 200 रुपए किलो बेच रहे हैं।















